तुलसी के काव्य में लोक-मंगल की भावना

 

सहित्यस्य भव: साहित्यम् अर्थात जिसमें हित साधन की भावना हो वही साहित्य है। इस परंपरा का अनुसरण करते हुए सगुण भक्ति धारा के श्रेष्ठ कवि तुलसीदास ने अपनी काव्य रचनाएं की है। अवधी और ब्रजभाषा दोनों में उसी क्षमता से लेखन करके अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। अनन्य रामभक्त होने के साथ ही साथ लोक कल्याणकारी भावना से ओतप्रोत रचनाएं करके इन्होंने राम भक्ति की जो निर्मल धारा प्रवाहित किया है वह नितांत लोकमंगलकारी सिद्ध हुई है।
जिस युग में तुलसीदास ने रचनाएं की है वह भारत के लिए पराभव का समय था। इन विषम परिस्थितियों में आमजन में काफी निराश व परेशानी थी। दूसरी ओर शास्त्र रचनाओं की जो परंपरा पहले से विद्यमान थी उससे आमजन अपने आप को जोड़ नहीं पा रहा था। अतः ऐसे में इन्होंने लोक भाषा में रचनाएं करके हताश तथा निराश जनता को राम भक्त का जो आलंबन प्रदान किया उसे लोक मानस में छाए हुआ अंधेरा छंटने लगा तथा भक्ति पथ पर चलने को रोशनी मिली। तुलसीदास की धारणा थी-
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामय:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दु:ख भाग भवेत्।।
अर्थात सभी सुखी रहे, सभी सांसारिक माया मोह से दूर रहे, सभी सतकल्याणमय में कार्यों के अभिलाषी रहें और किसी को कभी कोई दुःख न हो।
आज के समय में जब समाज में ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ तथा लोभ आदि का बोलबाला है तो इनके द्वारा स्थापित मूल्यों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। ये अपनी बातों को बहुत ही सरल ढंग जनता तक पहुंचा देते हैं। इनकी सूक्तिपरक रचनाएं जहां शहद की मीठी गोली के समान तन मन को मीठास से भर देती है वहीं पर हमें प्रेरणा भी देती है। ‘ जेहि के जेहि पर सत्य सनेहूं, तो तेहि मिले नहिं कछु संदेहूं’ कहकर तुलसी ने यह संकल्प बांटा है कि यदि आपकों किसी लक्ष्य पर पहुंचना है तो संकल्प सच्चा होना चाहिए। इतना ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र हम तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त सूक्तियों को आसानी से देख सकते हैं। चाहे वह पारिवारिक संबंधों से जुड़ा हो, चाहे राजनीतिक प्रसंगों से जुड़ा हो, चाहे गुरु शिष्य संबंधों से जुड़ा हो और चाहे जीवन के विविध मनोभावों जैसे दया,संयम,काम,शत्रुता,प्रेम, परोपकार, मित्रता, स्वार्थ आदि से हो। गुरु शिष्य संबंध श्रद्धा एवं आत्मियता पर आधारित बताते हुए उनका मत है कि गुरु-शिष्य का संबंध केवल गुरुकुल तक सीमित न होकर जीवनपर्यंत होता है। वह केवल शिक्षा ही नहीं देता है बल्कि शिष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रेरणा देने वाला पर प्रदर्शक भी होता है।ऐसे में गुरु का आशीर्वाद के बिना कुछ भी संभव नहीं है-
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुल सुधारि।
गुरु से छिपाव दुराव रखने पर कभी हमें विमल बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती है-
होई न विमल विवेक उर। गुरु सन किए दुरावा।।
व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में संगति का विशेष प्रभाव पड़ता है। तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में अच्छी संगत को बुद्धि, यश, ऐश्वर्य तथा भलाई आदि गुणों को समृद्धि करने वाला माना है –
सत्संगति मुद मंगल मूला। होई फल सिधि सब साधन फूला।।
भारतीय समाज तथा संस्कृति में कर्म की महत्ता की व्यापक चर्चा मिलती है। कर्म के बिना संसार की गति असंभव है। तुलसीदास अपनी रचनाओं एवं सूक्तियों के माध्यम से जन जन में कर्म के महत्व बतलाते हुए उसे अकर्मण्य से निरंतर कर्मरत रहने के लिए प्रेरित करते है-
करम प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करई सो तब फल चाखा।।
इनकी यह व्यक्तिगत सीख समाज उन्नत बनाने में सहायक होती है। ऐसे में इन्होंने अपनी रचनाओं में व्यक्तिगत साधना को जितना महत्व दिया है उससे कहीं ज्यादा लोक धर्म को भी स्थान दिया है। लोकमंगल के विधान को स्वीकार करते हुए लिखा है-
कीरति भनिति भूति भल सोई।
सुरसरि सम सब कहं हित होई।।
अर्थात कीर्ति, कविता और ऐश्वर्य वही अच्छा होता है जो गंगा के समान सबका हित करने वाला हो। जो कविता लोग मंगल का विधान नहीं करती है जिसे पढ़ने के बाद मन में सदवृत्तिया जागृत नहीं होती है वह भला किस काम की है?
इनकी रचनाओं पर यदि नजर डालें तो तुलसीदास व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज की व्यापक संदर्भों में अपनी लेखनी के माध्यम से आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया है। इस संसार में तीन गुण विद्यमान है। सत्त्व, रजस और तमस। लोक कल्याण तभी हो सकता है जब तमोगुण और रजोगुण सत्वगुण के अधीन होकर उसके इशारे पर चलते हैं। तुलसी काव्य के नायक श्री राम ही नहीं बल्कि अन्य पत्र भी सत्वगुण से प्रेरित है। राम अपने पिता की आज्ञा मानकर आदर्श पुत्र की भूमिका निभाते हैं, सीता आदर्श पत्नी, हनुमान सेवक धर्म का, तो भरत स्वार्थिनी माता तथा राज पाठ का त्यागकर आदर्श भ्रातृप्रेम प्रेम का उदाहरण दुनिया के सामने प्रस्तुत करते हैं। राम और सुग्रीव ने एक दूसरे की मित्रता को बाखूबी निभाया है। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है-
जो न मित्र दु:ख होहि दुखारी।
तिनहिं विलोकत पातक भारी।।
अर्थात आदर्श मित्र वही है जो अपने मित्र का दुख अपना मानकर उसके निवारण का प्रयास करता है। ऐसे में इन्होंने रामचरित मानस के प्रत्येक पात्र के माध्यम से लोग को शिक्षित तथा आदर्श आचरण करने के लिए प्रेरित किया है। इनके प्रत्येक पात्र संसार में लोकमंगल की स्थापना में सहायक होते हैं। सचमुच मानस की कथा को तुलसी ने कलयुग के पापों को नष्ट करने वाली,लोक और परलोक में सुख देने वाली,विषय विकारों को नष्ट करने वाली तथा उदात्त मानवीय मूल्यों का समावेश करते हुए वसुधैव कुटुम्बकम, बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय के रुप में प्रस्तुत करके पूर्णतया लोक-मंगलकारी बना दिया है। इसकी नींव सदाचार, संयम तथा त्याग पर टिकी हुई है जिससे भक्ति रुपी भवन निर्मित होता है। इनकी रचनाओं खासकर रामचरितमानस का मूल उद्देश्य असत पर सत की विजय है। तुलसीदास के अनुसार मनुष्य लोभ मोहादि जैसे विकारों में लीन रहकर अपने जीवन को व्यर्थ गवां देता है। वे इस मत को अधिकार के साथ प्रतिष्ठित करते हैं कि रामकथा ही एकमात्र ऐसा अमृत का स्रोत है जिसमें डुबकी लगाकर मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे में उन्होंने साहित्य का सृजन स्वान्त: सुखाय के लिए न करके परान्त: सुखाय के लिए किया है।
तुलसीदास ने अपने समय की बिखरे हुए समाज को सहेजने का काफी प्रयास किया है। जाति-पाति ,ब्राह्मण शूद्र, ऊंच नीच, छूआछूत आदि के पारस्परिक भेदभावों से हिंदू समाज पतन के कगार पर जा रहा था। ऐसे में इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से इन रुढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया है। ‘हरि का भजै सो हरि का होय’ की परंपरा को पुष्ट करते हुए भक्ति संसार में किसी भी भेदभाव को सिरे से नकार दिया है। साथ ही समाज में निम्न माने जाने वाले वर्गों जैसे नाई, धोबी, केवट आदि को अपनी रचना में सम्मानजनक स्थान दिया है। निम्न वर्ग से आए इन पत्रों को तुलसी के राम ने अपने गले लगाकर उन्हें सखा तथा मित्र के रूप में अपनाया है। मानवता को सर्वोपरि मूल्य मानते हुए राम अपने राजत्व का त्याग कर वनवासियों से इस कदर घुल मिल जाते हैं कि दोनों में अंतर करना कठिन हो जाता है। उन वनवासियों की सहायता से राम अत्याचारी, दमनकारी तथा अहंकारी रावण को परास्त करके सीता को छुड़ाने के साथ-साथ उन्हें भी उसके अत्याचारों से मुक्त कराते हैं। तुलसीदास का मानना है कि राजा को निज स्वार्थ त्याग कर प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन अच्छे ढंग से करना चाहिए। उसे परिवार तथा सगे संबंधियों से ऊपर उठकर सदैव राष्ट्र को प्रथम स्थान देना चाहिए। क्योंकि जो राजा प्रजा के प्रति ईमानदार नहीं है उसका कभी भला नहीं हो सकता है-
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।
तत्कालीन समाज में निम्न वर्ण के साथ-साथ स्त्रियों की दशा भी काफी दयनीय थी। कठोर पर्दा प्रथा तथा पुरुषवादी सत्ता के कारण उनका कई तरीके से शोषण होता था। यद्यपि कई लेखक तुलसीदास को नारी विरोधी सिद्ध करने पर तुले रहते हैं पर उन्हें तुलसी की यह पंक्ति ‘ कत विधि सृजी नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ अर्थात पराधीन नारी के लिए स्वप्न में भी सुख न होने पर क्षोभ व्यक्त किया है। उन्होंने समय समय पर नारी के ज्ञान और साहस की प्रशंसा की है । उन्होंने सीता के माध्यम से भारतीय नारी के शील गुण, सहनशीलता तथा कर्तव्य पारायण आदि गुणों का भी चित्रण किया है।
ऐसे में कह सकते हैं कि तुलसीदास अपने समन्वयवादी दृष्टिकोण के कारण समाज में अपनी रचनाओं के माध्यम से लोकमंगल की स्थापना करने में सहज रूप से सफल हुए हैं। लोकमंगल का यह विधान उन्हें लोकनायक सिद्ध करता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि ‘लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके। तुलसी का संपूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।
(आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित)

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
8400088017