अनुराग लक्ष्य, 26 अगस्त
मुंबई संवाददाता ।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुद्दत गुजर गई, कोई ऐसे खुशनुमा सुबह नहीं देखी, जिसमें सूरज अपनी तमाजत के साथ हंसता और मुस्कुराता हुआ दिखाई दिया हो। साथ ही सुरमई शाम अपनी तमाम शोखियों के साथ खिलखिलाती नज़र आई हो। यह बात मैं इस लिए नहीं कह रहा हूं, कि मैं एक पत्रकार और गीतकार हूं, बल्कि मैं इस लिए कह रहा हूं कि लगभग डेढ़ अरब आबादी वाले देश भारत का में भी एक आम इंसान हूं। जिसने इस दर्द और कर्ब के धुंधलके को महसूस किया और बात ज़बान तक आई।
क्या है इसके पीछे का सबब, कौन से हैं वोह अनसुलझे राज़ जो अपने सीने में धधकती हुई आग से पूरी इंसानियत को तार तार कर ने पर आमादा है। शायद यह बात आज मेरे लबों तक आई, जिसे मैने आप तक पहुंचना ज़रूरी समझा, कि,
,,, मैं जा रहा हूं मस्जिद सजदे में सर झुकाने
क्यों दे रहे हों मुझको तलवार और भाला
मन्दिर की घंटियां भी बजने लगी हैं देखो
जाओ बुला रहा है कबसे तुम्हें शिवाला,,,