कजरी गीत*
झूला डारीं कइसे नीबिया के डार सखी,
करीं हम विचार सखी ना।
जबसे कटे लागल पेड़,
दूभर जिनगी क खेल,
एसी कूलर में फसल परिवार सखी,
करीं हम विचार सखी ना।।
कहीं सूखल नदी ताल,
कहीं बाढ़ से बेहाल,
धरती करे लागल निशदिन गुहार सखी,
करीं हम विचार सखी ना।।
पहिले जइसन नाहीं गाँव,
कहीं मिलत नाहीं छाँव,
नीक लागे नाहीं सोरहो सिंगार सखी,
करीं हम विचार सखी ना।।
अबकी सावन महीना,
खुद से वादा हम करीं ना,
बढ़ी पेड़वा जियईले बहार सखी,
करीं हम विचार सखी ना।।
© प्रतिभा गुप्ता
खजनी, गोरखपुर
मो.नं.- 8299453084