दूरदर्शन नहीं आत्मदर्शन -आचार्य सुरेश जोशी

🔥ओ३म् 🔥
🌻 *दूरदर्शन नहीं आत्मदर्शन*🌻
दुनिया में सर्वप्रथम दूरदर्शन का निर्माण वैदिक काल में ही हो चुका था। ऋषियों ने उसका नाम *🌸 दिब्य-दृष्टि🌸* रखा था। महाभारत काल में महान *संत वैज्ञानिक संजय ने इसी के माध्यम से दिव्यांग धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के मैदान का महासंग्राम सुनाया था* वैदिक ऋषियों ने इन यंत्रों का प्रचार अधिक नहीं किया क्योंकि वो जानते थे इससे विलासिता बढ़ेगी और आध्यात्मिक उन्नति रुक कर मानवता अशांति को प्राप्त होगी।उनका मुख्य लक्ष्य 🧘 *आत्मदर्शन यानि आध्यात्मिक उन्नति करके शाश्वत आनंद* को प्राप्त करना था। मगर पाश्चात्य संस्कृति ने ऋषियों के *वैदिक दर्शन* की उपेक्षा की और। *दूरदर्शन लाकर मानवता को भौतिकवादी* दुनियां में धकेल दिया।
आज पुनः समय की मांग है कि परिवारों को 🌸 *आत्मदर्शन यानि सत्संगों 🌸* से जोड़ा जाए।
🪷 *पारिवारिक सत्संग 🪷*
बाराबंकी के हजारा बाग क्षेत्र में आज का पारिवारिक सत्संग 🌹 *मान्या ब्यूटी पार्लर 🌹* में सम्पन्न हुआ।पावन वेद मंत्रों से 🔥 अग्निहोत्र के साथ 🔥
आत्मिक उन्नति के महत्व को एक दृष्टांत
के साथ बताया गया ।
*एक आदमी की चार पत्नियाँ थी ।*
*वह अपनी चौथी पत्नी से बहुत प्यार करता था और*
*उसकी खूब देखभाल करता व उसको सबसे श्रेष्ठ देता*
*वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्यार करता था और*
*हमेशा उसे अपने मित्रों को दिखाना चाहता था ।*
*हालांकि उसे हमेशा डर था की वह कभी भी किसी*
*दुसरे इंसान के साथ भाग सकती है!*
*वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्यार करता था जब*
*भी उसे कोई परेशानी आती तो वे अपनी दुसरे नंबर*
*की पत्नी के पास जाता और वो उसकी समस्या*
*सुलझा देती ।*
*वह अपनी पहली पत्नी से प्यार नहीं करता था*
*जबकि पत्नी उससे बहुत गहरा प्यार करती थी*
*और उसकी खूब देखभाल करती ।*
*एक दिन वह बहुत बीमार पड़ गया और जानता था*
*की जल्दी ही वह मर जाएगा । उसने अपने आप से*
*कहा, “मेरी चार पत्नियां हैं, उनमें से मैं एक को अपने*
*साथ ले जाता हूँ..जब मैं मरूं तो वह मरने में मेरा साथ*
*दे ।*
*तब उसने चौथी पत्नी से अपने साथ आने को कहा*
*तो वह बोली, “नहीं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता और*
*चली गयी ।*
*उसने तीसरी पत्नी से पूछा तो वह बोली की*
*”ज़िन्दगी बहुत अच्छी है यहाँ जब तुम मरोगे*
*तो मैं दूसरी शादी कर लूंगी*
*उसने दूसरी पत्नी से कहा तो वह बोली, “माफ़ कर*
*दो, इस बार मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती ।*
*ज्यादा से ज्यादा मैं तुम्हारे दफनाने तक तुम्हारे साथ*
*रह सकती हूँ ।*
*अब तक उसका दिल बैठ सा गया और ठंडा पड़*
*गया । तब एक आवाज़ आई, “मैं* *तुम्हारे साथ चलने*
*को तैयार हूँ । तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ चलूंगी*
*उस आदमी ने जब देखा तो वह उसकी पहली*
*पत्नी थी । वह बहुत बीमार सी हो गयी थी खाने*
*पीने के अभाव में ।*
*वह आदमी पश्चाताप के आंसूं के साथ बोला*
*मुझे तुम्हारी अच्छी देखभाल करनी चाहिए*
*थी और मैं कर सकता था ।*
*दरअसल हम सब की चार पत्नियां हैं जीवन में*
🪷1. चौथी पत्नी हमारा शरीर है ।
हम चाहें जितना सजा लें संवार लें पर जब हम
मरेंगे तो यह हमारा साथ छोड़ देगा ।
🪷2. तीसरी पत्नी है हमारी जमा पूँजी, रुतबा ।
जब हम मरेंगे तो ये दूसरों के पास चले जायेंगे।
🪷3. दूसरी पत्नी है हमारे दोस्त व रिश्तेदार । चाहें वे
कितने भी करीबी क्यूँ ना हों हमारे जीवन काल में
पर मरने के बाद हद से हद वे हमारे अंतिम संस्कार
तक साथ रहते हैं ।
🪷4. *पहली पत्नी हमारी आत्मा है, जो सांसारिक*
*मोह माया में हमेशा उपेक्षित रहती है ।*
*यही वह चीज़ है जो हमारे साथ रहती है* *जहाँ भी
हम जाएँ…….*कुछ देना है तो इसे दो….* *देखभाल*
करनी है तो इसकी* करो…. प्यार करना है* तो इससे
करो…*🪷
*मिली थी जिन्दगी*
*किसी के ‘काम’ आने के लिए..*
*पर वक्त बीत रहा है*
*कागज के टुकड़े कमाने के लिए..!!*
आओ हम सब *पारिवारिक सत्संगों द्वारा* एक पवित्र मानव का निर्माण करके मानवतावाद की आधार शिला रखें!
आचार्य सुरेश जोशी
🌻 *वैदिक प्रवक्ता 🌻*