ग़ज़ल
हुनर अजीब सा आली जनाब रखते हैं।
दुरुस्त बात का झूठा जवाब रखते हैं।।
जो ढाई हर्फ़ लिए आता है हमारी तरफ।
हम उसके वास्ते पूरी किताब रखते हैं।।
कोई तुम्हारी जो तस्वीर मांगता है कभी।
हम उसके सामने लाकर गुलाब रखते हैं।।
कहां पे चोट लगी और कितना दर्द हुआ।
दिवाने लोग कब इसका हिसाब रखते हैं।।
वो जिसकी दुनिया में ताबीर है बहुत मुश्किल।
हम अपनी आंखों में ऐसे ही ख़्वाब रखते हैं।।
जहां पे फैल रहा हो अंधेरा नफरत का।
वहां पे लाके नया आफताब रखते हैं।
तमाम दर्द है दिल में हमारे ऐ हर्षित।
खुशी लबों पे मगर बे हिसाब रखते हैं।।
विनोद उपाध्याय हर्षित