अब ये सवाल मुझ से दुबारा न पूछीये।

ग़ज़ल

अपना है कौन,कौन पराया न पूछीये,

अब ये सवाल मुझ से दुबारा न पूछीये।

ये आप ही की ज़िद थी,भँवर में जो जा फसें,

अब चींख चींख सब से किनारा न पूछीये।

गर्दिश में लड़खड़ाते मैं पहुंचा हर एक दर,

किस किस का मैंने पाया सहारा न पूछीये।

सड़कों पे लूटमार,ज़ेना,जलती बस्तियाँ,

था इसके पीछे किसका इशारा न पूछीये।

बस पेट भर रहे हैं मदारिस के ये यतीम,

मिलता है कैसा उनको नेवला न पूछीये।

सर्दी भी ऐहतियात से जाती है उन तलक,

फुटपाथों के मकीं का दुशाला न पूछीये।

रिश्ते का तक़ाज़ा है कि मिलिए नदीम से,

मैसेज से आप हाल हमारा न पूछीये।

नदीम अब्बासी “नदीम”

गोरखपुर॥