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जो रूपये पैसे फेंक,
दाम लगाएं बोटी का,
वो क्या जाने मोल भला?
दो जून की रोटी का।
चार पैसे की खातिर मंगरू
छोड़ आया घर गांव अपना,
मां की थपकी,बाप की घुड़की,
नीम, पीपल की छाँव का सपना।
मेहनतकश इंसान ही जाने,
मोल लगे क्या रोटी का?
जो रूपये पैसे फेंक,
दाम लगाएं बोटी का।
वो क्या जाने मोल भला?
दो जून की रोटी का,
बिटिया इक्कीस की हो गई
शादी बहुत जरूरी है।
पैसे दवा दारू के भेजो,
माँ भी तो अब बूढ़ी है।
पढ़ने लिखने लायक हो गई,
नाम लिखा दो छोटी का।
मेहनतकश इंसान ही जाने,
मोल लगे क्या रोटी का?
जो रूपये पैसे फेंक,
दाम लगाएं बोटी का।
वो क्या जाने मोल भला?
दो जून की रोटी का।
रोटी है अनमोल ये जानो,
भूख की कीमत को पहचानो।
विकल हृदय आबाद करो,
यूँ न अन्न बर्बाद करो।
जीवन तो संघर्ष भरा है
खेल नही है गोटी का,
मेहनतकश इंसान ही जाने
मोल लगे क्या रोटी का?
जो रूपये पैसे फेंक,
दाम लगाएं बोटी का।
वो क्या जाने मोल भला?
दो जून की रोटी का।
जिन्हें समस्त सृष्टि ने माना
उन्हें परोस चावल का दाना,
अतुल स्नेह और भक्ति से,
द्रौपदी वश हुए थे कान्हा।
जाने ‘अणिमा’ जो रहस्य को,
पुण्य लगेगा कोटि का।
मेहनत कश इंसान ही जाने,
मोल लगे क्या रोटी का?
जो रूपये पैसे फेंक
दाम लगाएं बोटी का,
वो क्या जाने मोल भला?
दो जून को रोटी का…।
डॉ अणिमा श्रीवास्तव
पटना (बिहार)