🌼 *ओ३म्* 🌼
🧘 ईश्वरीय वाणी वेद 🧘
*ओ३म् चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् ।यज्ञं दधे सरस्वती।।
।।ऋग्वेद १/३/११।।
🐢 *मंत्र का पदार्थ*🐢
( सूनृतानां ) जो मिथ्या वचन के नाश करने,सत्य वचन और सत्य कर्म को सदा सेवन करने ( सुमतीनाम् ) अत्यंत उत्तम बुद्धि और विद्या वाले विद्वानों की ( चेतन्ती ) समझने तथा ( चोदयित्री ) शुभ गुणों को ग्रहण करने वाली ( सरस्वती ) वाणी है,वही सब मनुष्यों के शुभ गुणों के प्रकाश कराने वाले यज्ञ आदि कर्म धारण करने वाली है।
🌸 *मंत्र का भावार्थ*🌸
जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्यायुक्त और छल आदि दोष रहित विद्वान मनुष्यों की सत्य उपदेश करने वाली यथार्थ वाणी है वही सब मनुष्यों के सत्य ज्ञान होने के लिए योग्य होती है अविद्वानों की नहीं।
🕳️ *मंत्र का सार तत्व*🕳️
संसार में विद्वानों की दो श्रेणी होती है। *एक शब्द ज्ञानी और दूसरे आप्त यानि तत्वज्ञानी* जो शब्द ज्ञानी हैं वो मंत्रों के अर्थ, पदार्थ,अन्वय, टिप्पणी,भाष्य करने में समर्थ होते हैं। पुस्तक भी लिख सकते हैं। उनके पढ़ाने से विषय का ज्ञान व अध्यापन की योग्यता भी आ जाती है परंतु वो जीवन में क्रांति नहीं लाती।
इसके विपरीत जो *आप्त* विद्वान हैं उनकी वाणी मानवों के *शरीर,वाणी,मन सहित समस्त अंत:करण* को शुद्ध कर मानव के परं लक्ष्य को प्राप्त कराती है। अतः मनुष्यों को चाहिए कि सदा *आप्त विद्वानों की संगति में ही रहें अविद्वानों* की नहीं।
अब मन में उत्सुकता होगी कि आप्त पुरुष वा आप्त विद्वानों की परख कैसे हो? इसका उत्तर देते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने *स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश* नामक पुस्तिका में लिखा है कि जो यथार्थ वक्ता, धर्मात्मा,सबके सुख के लिए प्रयत्न करता है,उसी को *आप्त* पुरुष कहता हूं।
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*