आक्रोश – अंजना सिन्हा

सभी आपदाओं में मानवजनित आक्रोश रूपी आपदा परिवार को तहस-नहस कर देती है। एक पुरुष की निकृष्ट सोच भी महाप्रलयंकर होती है ।
यह कहानी सत्य घटना पर आधारित कुछ वर्ष पूर्व की है। मेरे पड़ोस में एक परिवार रहते थे। उस परिवार में पति – पत्नी और उनके तीन बच्चे थे। घर में आए दिन झगड़े हुआ करते थे। पति बहुत ही गुस्से वाले और शक्की मिजाज के थे जबकि उनकी पत्नी हँसमुख , मिलनसार और सामाजिक स्वभाव की थी। मंदिरों में भजन-कीर्तन करना और लोगों के सुख-दुख में हमेशा साथ देती थी। मैं उन्हें चाची कहकर बुलाती थी। धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया। बच्चे भी बड़े हो गए । एक दिन की बात है घरेलू झगड़े के तहत पति ने अपनी पत्नी को मारकर पंखे से लटका दिए। बिना किसी परिवार को बुलाए उनका दाह – संस्कार भी कर दिया गया। दाह- संस्कार के समय में सभी परिवार वालों को बताया गया। जब तक सभी आते तब तक सारे काम निपटा दिए गए। मुझे दुःख इस बात का हुआ कि सभी जानते थे कि मार दी गई है, फिर किसी एक ने भी उनका विरोध नहीं किया। क्या मानवता शर्मसार नहीं होती। क्या हो गया है लोगों की सोच को।आज भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनके मन में अगर कोई महिला किसी पुरुष से बात कर ले तो वह गलत है। भले ही वह मर्द इधर-उधर नाजायज संबंध रखता है, दूसरे की बीवी-बहन पर बुरी नजरें डालता है । क्या हो गया है सबकी सोच को कि ऐसे कुत्सित मानसिकता वाले मर्दों का कोई विरोध नहीं करता।

मेरे मन में कई सवाल आज भी है। 55 वर्ष की महिला को मार दिया जाता है बस शक के आधार पर ।

आखिर क्यों?

इस घटना के बाद मैंने एलएलबी की डिग्री ली। ताकि किसी महिला के साथ अन्याय ना हो और अब तक मेरा प्रयास जारी है।
ऐसे दुष्ट पति से कैसा संबंध ? ऐसे पुरुषों का महिलाएँ पूर्णतः बहिष्कार करें। निकाल फेंके अपनी जिंदगी से कूड़े-कचरे की तरह। ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों को जवाब देने हेतु सशक्त बनें एवं अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएँ हम ।

अंजना सिन्हा “सखी”
रायगढ़

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