ईश्वरीय वाणी वेद -आचार्य सुरेश जोशी

*ओ३म्*
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
🌴 दिनांक १३/५/२०२४🌴
🌻 *मंत्र परिचय* 🌻
ऋग्वेद १/१/८
ओ३म् राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिषिम् । वर्धमानं स्वे दमे।।
🌹 *मंत्र का पदार्थ*🌹
[ स्वे ] अपने [ दमे ] उस परम आनंद पद में कि जिसमें बड़े-बड़े दु:खों से छूटकर मोक्ष सुख को प्राप्त हुए पुरुष रमण करते हैं [ वर्धमानम् ] सबसे बड़ा [ राजन्तम् ] प्रकाश स्वरुप [ अध्वराणाम् ] धार्मिक मनुष्य तथा [ गोपाय ] पृथिव्यादिकों की रक्षा [ ऋतस्य ] वेद व कारण जगत् के अनादि कारण के [ दीदिविम् ] प्रकाश करने वाले परमेश्वर को हम लोग उपासना योग से प्राप्त होने हैं।
🥝 *मंत्र का भावार्थ*🥝
जैसे विनाश और अज्ञान आदि दोष रहित परमात्मा अपने अंतर्यामी रुप से सब जीवों को सत्य का उपदेश तथा श्रेष्ठ विद्वान और सब जगत की रक्षा करता हुआ अपनी सत्ता और परम आनंद में प्रवृत्त है रहा है, वैसे ही परमेश्वर के उपासक भी आनन्दित, वृद्धि युक्त होकर विज्ञान में विहार करते हुए परम आनन्द रुप विशेष फलों को प्राप्त होते हैं।
🐂 *मंत्र का सार*🐂
जो मानव ईश्वर की उपासना करता है अर्थात उप माने समीप यानि हृदय के निकट ध्यान लगाते हैं क्योंकि परमात्मा शरीर स्थित हृदय में ही विराजमान है। इस तरह नित्य हृदय में उपासना करने का लाभ यह होगा कि जैसे परमात्मा *आनंद में रहता है उसके ध्यान करने वाले भी सुख-शांति -आनन्द व ज्ञान -विज्ञान को प्राप्त होते हैं इसी का नाम उपासना योग है*।
आचार्य सुरेश जोशी
वैदिक प्रवक्ता
*7985414636*

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