एक ग़ज़ल…
चेतना को मुक्त करिए शोक से संताप से
कब तलक लड़ते रहेगें आप अपनेआप से
बस धमक ही चाहिए चूलें हिलाने के लिए
कुछ नही होने को है इस रुनझुनी पदचाप से
चाहिए था सिर्फ़ अपनेआप को पहचानना
एक इतना काम अबतक हो न पाया आपसे
आप निःसंकोच होकर अपनी ग़लती मानिए
पाप भी निष्प्राण हो जाता है पश्चाताप से
आ गया फिर आपके अवतार लेने का समय
हो चुकी है ये धरा बोझिल बहुत अब पाप से
हरीश दरवेश