जो साहिल से न टकराए समन्दर हो नहीं सकता, नवीन जोशी,

अनुराग लक्ष्य, 23 अप्रैल
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।
नवीन जोशी (तख़ल्लुस ‘नवा’) दौर-ए-हाज़िर के जाने माने शोअरा में से एक हैं। नवीन पेशे से कंपनी सेक्रेटरी हैं और महिंद्रा फाइनैंस में उच्च पदस्थ अफ़सर हैं। नवीन की आमद शाइरी के हल्कों में ज़रा ताख़ीर से हुई मगर इन्होंने मो’तबरी की तरफ़ बड़ी तेज़ी अपना सफ़र तय किया और एक आला शाइर के तौर पर बहुत जल्द अपनी पहचान बना ली। अपने मुन्फ़रीद उस्लूब-ओ-अदायगी से आज वह नशीस्तों और मुशाइरों के एक पसंदीदा शाइर बन चुके हैं। ख़ास कर मुंबई (जहाँ के वह रहने वाले हैं) और उसके आस-पास के अदबी इलाक़ों जैसे भिवंडी, मालेगांव वग़ैरा में नवीन की अपनी फैन फालोइंग है।

नवीन की शाइरी किसी एक मौज़ू से महदूद नहीं है मगर उम्र के जिस पाएदान पर वह आज हैं, उसके तक़ाज़े से इनकी शाइरी में रूहानियत, फ़लसफ़ा और तसव्वुफ़ के रंग ज़ियादा गाढ़े हैं।

नवीन एक आला शाइर होने के अलावा एक उम्दा मुसव्विर भी हैं और इन्होंने अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी की हैं। इन्होंने स्कूल के ज़माने में स्टेज पर अदाकारी के जौहर भी दिखाए हैं।

नवीन आज पूरे मुल्क़ में और बाहर भी इंशाद फ़ाउंडेशन के हवाले से जाने जाते हैं। नवीन इंशाद फाउंडेशन के बानी हैं और इंशाद शाइरी की नयी नस्ल की जिस तरह आबयारी कर रहा है इस के चलते वह जवाँ शोअरा के गले का तावीज़ बने हुए हैं।

आज अगर हमें लगता है कि सोशल मीड़िया पर जवाँ शोअरा की शोहरत बहुत बढ़ गयी है, अगर लगता है कि जवाँ शोअरा का शाइरी की दुनिया में जो आज मक़ाम है वह क़ाबिल-ए-रश्क़ है तो इसके पीछे जिन तंज़ीमों का हाथ है उनमें इंशाद फाउंडेशन सर-ए-फ़ेहरिस्त है और यह नवीन जी की दिन-रात की मेहनत का सिला है।

नवीन जी की शाइरी आप रेख़्ता और कविता कोष पर पढ़ सकते हैं। इसके अलावा नवीन सोशल मीड़िया पर मशहूर हैं और इनका हैशटैग #navaaiyat भी ख़ासा मशहूर है।
आइए हिंदुस्तानी अदब की ऐसी ही मायनाज़ शख्सियत मोहतरम जनाब नवीन जोशी साहब की एक मेआरी ग़ज़ल से आपको रूबरू कराता हूं, जिनके एक एक अशआर को आप कभी भूल नहीं सकते हैं,,,,
नमी हो जिसकी आंखों में वोह बंजर हो नहीं सकता,
जिसे मिट्टी से निस्बत हो वोह पत्थर हो नहीं सकता ।

वोह साहिल हो नहीं सकता तालातुम का जिसे हो डर,
जो साहिल से न टकराए समन्दर हो नहीं सकता ।

सुकूं हो, प्यार हो या फिर वोह चाहे खुद खुदा ही हो,
अगर भीतर नहीं है तो वोह बाहर हो नहीं सकता ।

ज़माने भर की लाशों पर भी हो जाय खड़ी नफ़रत,
पर उसका कद मुहब्बत के बराबर हो नहीं सकता ।

,,,, परस्तुति, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *