ग़ज़ल
ऐसा वैसा न कोई दूसरा रास्ता देखूं।
दिल की ख्वाहिश है के इक रोज़ मदीना देखूं।।
मेरे अल्लाह मेरे पास हो इतनी हिम्मत।
वक्त कोई हो मगर खुद को मैं हंसता देखू।।
काश लोगों को मुहब्बत की समझ आ जाए।
मैं मुहब्बत का कहीं फिर न तमाशा देखूं।।
अपने अंदर किसी अहसास को ज़िंदा देखूं।
जब कहीं दूर मैं बहता हुआ दरिया देखूं।।
दिल की बेताबी मिटाने के लिए क्या देखूं।
तेरी तस्वीर उठा कर तेरा चेहरा देखूं।।
ज़ुल्म देखा है उठाए हैं बहुत गम हर्षित।
ज़िंदगी तू ही बता और यहाँ क्या देखूं।।
विनोद उपाध्याय हर्षित