शीर्षक- गीत गाए अब कौन
तुम हो थोड़े मुखर से
और हम हैं थोड़े मौन
जीवन की इस वीणा पर
प्रेम के गीत गाए अब कौन।
तुम जैसे अंबर की ऊंचाई
और हम नदिया की गहराई
दोनों मैं मीलों की दूरी
मिलन कराये कौन।
तुम भावनाओं का प्रबल वेग
और हम विचारों की चट्टान
तुम चंचल हम दृढ़ उसूल
सुलह कराये कौन।
तुम जैसे शीत में ओस की बूंद
और हम सागर की प्यासी मीन
अपनी अपनी नियति से बंधे हम
मुक्त कराऐ कौन।
तुम जैसे प्रेम का प्रथम अंकुर
और हम कर्तव्य की बढ़ती बेल
दोनों का अपना आकाश
आवाज़ लगाए कौन।
तुम ख्वाहिशों का उन्नत शिखर
और हम यथार्थ का कठोर धरातल
स्वप्न की इस सुंदर नगरी में
फूल खिलाए कौन।
तुम हो थोड़े मुखर से
और हम हैं थोड़े मौन
जीवन की इस वीणा पर
प्रेम के गीत गाए अब कौन।
स्वप्रमाणित मौलिक रचना
श्रीमती प्रियंका मिश्रा” कुमुद “
लश्कर ग्वालियर मध्य प्रदेश।