अत्यधिक धन भी क्लेश का कारण बनता है धन है भी तो पर्दा रखें प्रदर्शन नहीं

मुंडेरवा। स्थानीय थाना क्षेत्र के ग्राम दीक्षापार में अष्टम दिवस पर स्यमंतक मणि की कथा समझाते हुए कहा कि अधिक धन भी सुख शांति और जीवन के लिए संकट का कारण बनता है। राजा सत्राजित के प्राणों के करण वही स्यमंतक मणि बनी । आप अपने धन का प्रदर्शन करेंगे तो अनावश्यक ही शत्रु बन जाएंगे । उक्त विचार उज्जैन महाकाल से पधारे महामृत्युंजय पीठाधीश्वर स्वामी प्रणव पुरी जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किया।

महाराज जी ने कहा की भगवान श्री कृष्णा को भी मणी के कारण कलंक लगा जिसे उन्होंने मणी खोज कर स्पष्ट किया। भगवान ने 16108 देवियों से विवाद किया इस पर मूर्ख मनुष्य व्यंग्य करते हैं उन्हें यह विचार करना चाहिए कि भगवान तो 84 लाख योनियों के पति हैं। महाराज जी ने कहा की 16000 तो बहुत कम गिनती है। स्वामी जी ने सुदामा चरित्र सुनाते हुए कहा कि आज पद प्रतिष्ठा पाकार हम अपने पुराने दिनों को याद भी नहीं करना चाहते हैं। पुराने मित्रों को भी भूल जाते हैं। वहीं भगवान सुदामा से इस प्रकार मिले जैसे बचपन में मिलते थे। महाराज जी ने कहा कि सुदामा ने मात्र चूड़ा भगवान को भेंट किया था उसके बदले प्रभु ने उन्हें सर्वस्व दे दिया। प्रभु स्वयं कहते हैं कि भक्ति के द्वारा पुष्प पत्र आदि से ही वह प्रसन्न हो जाते हैं।बस श्रद्दापूर्ण होनी चाहिए ।कथा के विराम होते हुए परीक्षित मौक्ष के प्रसंग पर बताया कि यह शरीर रूपी घड़ा अलग-अलग प्रतीत होता है। संसार में किंतु आत्मा सबके लिए एक ही है। इस प्रकार जैसे दीपक बुझने से प्रकाश का अंत नहीं होता है आत्मा शरीर के नष्ट होने पर भी अजर अमर रहती है।मुख्य यजमान के रूप में रूप में कैप्टन रमाकांत शुक्ल, श्रीमती चंद्रवती देवी, तथा परिवर के अन्य सदस्यों के साथ प्रवचन के समय उमाकांत शुक्ल, शशिकांत शुक्ल, अमित शुक्ल, राम अवध, पांडेय, शुक्ल, त्रिपुरारी पांडेय,राम अवध पांडे, , परशुराम शुक्ल,मोहन शुक्ल,शुक्ल, मोहन शुक्ल मेवालाल , तमाम महिला व पुरुष उपस्थित रहे।

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