ग़ज़ल
कितना दिलकश कितना प्यारा बचपन था
यादों से पुर नूर वो दिल का आँगन था
कैसे वो सैराब मुझे करता यारो
इक अरसे से खुद ही प्यासा सावन था
गुलचीं की गफलत से छाई बदहाली
मिस्ले जन्नत पहले मेरा गुलशन था
ज़ाहिर बातिन एक हमेशा ही पाया
गोया वो किरदार से अपने दर्पन था
लोगों ने तो कोशिश पूरी की लेकिन
टूट न पाया प्यार का ऐसा बंधन था
चाहा था दूं उसको तोहफा मर्ज़ी का
ला न पाया बेहद महंगा कंगन था
उरयां पोशाकों में सिनफे नाजुक थीं
दौरे नौ का तौबा कैसा फैशन था
मौत का साया सर पे छाया था सब के
कुछ दिन पहले कितना मुश्किल जीवन था
इज़हारे उल्फत का जो मौक़ा आया
जाने क्यों होंटों पे उसके कंपन था
मिल जुल के सब साथ में रहते थे पहले
खुशियों के लम्हों में डूबा मसकन था