चार दिन की ये ज़िन्दगानी है।
याद रखने को फिर कहानी है।
किस्सा रह जाता है अधूरा ही।
छोड़ के जानी बस निशानी है।
याद हमको भी वो करेंगे ही।
बात मतलब की जब भी आनी है।
जाने कैसा मिज़ाज़ पाया है।
है जहां में मग़र रूहानी है।
चाह क्यों हम रखें ज़माने से।
रश्मि हर शय यहां पे फ़ानी है।
ज्योतिमा शुक्ला ‘रश्मि’