मुसलसल रातों में तन्हा लिख रहा हूं।
तुम्हें याद कर मै बहर लिख रहा हूं।।
एक दिन पूरा होगा मेरा कलाम।
यही सोच मै सुबह शाम लिख रहा हूं।।
हिज् की तनहाइयों में डूबोकर कलम।
घायल मन से टूटे शब्द लिख रहा हूं।।
एक दिन समझोगे तुम मेरे जज्बात।
खून से खत तेरे नाम लिख रहा हूं।।
पूरे कायनात को बना कर साक्षी।
एक- एक कूचा ,शहर लिख रहा हूं।।
दीश की अनकही समझ लेना तुम।
पहेली मै बहुत सरल लिख रहा हूं।।
जगदीश कौर
प्रयागराज