मंजिलें इश्क़ पे मैं खुद ही पहुंच जाऊंगा, -शारिक खलीलाबादी,,

अनुराग लक्ष्य, 24 अक्टूबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुंबई संवाददाता ।
कभी कभी ऐसा होता है कि खुश्बू हमारे बिलकुल क़रीब होती है, और हमें उसका एहसास ही नहीं हो पाता, लेकिन हम जब उसके एहसासात से गुज़रते हैं तो बस उसी के होकर रह जाते हैं। यह सानेहा मेरे साथ भी हुआ, जब आज से तकरीबन 20 साल पहले उत्तर प्रदेश के संत कबीर की धरती, ज़िला संत कबीर नगर के निवासी, बड़े भाई मोहतरम जनाब शारिक खलीलाबादी से एक मुशायरे में मेरी पहली मुलाकात हुई। एक नेक दिल और संजीदा इंसान के साथ साथ एक कोहना मश्क इंकलाबी शायर की शख्सियत अपने अंदर समेटे हुए वोह आज भी पूर्वांचल की धरती पर अपने मेआरी कलाम के लिए जाने और पहचाने जाते हैं।
यूं तो अदब की दुनिया में पूर्वांचल में बहुत से शोआरा हज़रात अपनी बेहतरीन शायरी के लिए जाने और पहचाने जाते हैं लेकिन जो रंग मोहतरम शारिक खलीलाबादी की शायरी में दिखाई देता है, वोह दूर दूर तक नज़र नहीं आता। आज हम अपने पाठकों को एक ऐसे ही मेआरी और इंकलाबी शायर जनाब शारिक खलीलाबादी की एक नायाब ग़ज़ल से रूबरू करा रहे हैं।
1/ दिल में फिर लज़्ज़त ए आलाम रहे या न रहे
क्या पता हिज्र की यह शाम, रहे या न रहे ।
2/ साकिया तिशना लबी आज आज बुझा लेने दे
क्या ख़बर हाथों में कल जाम, रहे या न रहे।
3/ ऐ शबे हिज्र तिरा साथ निभाना है मुझे
दर्द के साए में आराम, रहे या न रहे ।
4/ मंज़िलें इश्क़ पे मैं खुद ही पहुंच जाऊंगा
साथ मेरे कोई दो गाम, रहे या न रहे ।
5/ आख़िर इन बातों से है क्या तुझे लेना, देना
हम तिरे इश्क़ में बदनाम, रहे या न रहे।
6/ सैकड़ों जुगनू चमक उठते हैं पलकों पे मिरी
रोशनी घर में सरे शाम, रहे या न रहे।
7/ साथ कुछ लम्हे बुजुर्गों के गुजारो बेटा
गो कि उन लोगों से कुछ काम, रहे या न रहे।
8/ मुझको इस बात का थोड़ा भी नहीं ग़म ,शारिक,
बाद मरने के मिरा नाम, रहे या न रहे।
पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,

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