एक उदाहरण बनकर जीना दुष्कर होता है कितना, राजेन्द्र सिंह राही,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 18 सितंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
यह सच है कि गीतों और ग़ज़लों की दुनिया बहुत विशाल है । इसमें गोता लगाने वाले का ख़ून बहुत जलता है । लेकिन अच्छा और कुशल तैराक अपनी मंज़िल पर पहुंच ही जाता है। शर्त यह है कि उसका जुनून और विश्वास दोनों पक्का होना चाहिए।
बस्ती की धरती से एक ऐसा ही शायरी का तैराक मंज़र ए आम हुआ है, साहित्यिक गतिविधियों में जिसे गीतकार राजेन्द्र सिंह राही के नाम से जाना और पहचाना जाता है। आज उसी रचनाकार का एक सार्थक गीत से आपको रूबरू कराता हूँ ।

आदर्शों की बातें करना, आदर्शों पर वा चलना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।

रह जाते हैं कुम्हलाये से, आंखों में कितने‌ सपने।
थक जाते हैं चलते-चलते, साथ हमारे जो अपने।।
होती रहती अग्नि परीक्षा, पड़ता तानों को सहना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।

कितने ही चलचित्र मोह के, बंधन बांधे राह रोकते।
संलिप्ता की थाल सजाए, निर्लिप्ता के लिए टोकते।।
भारी पड़ जाता है अक्सर, व्यवधानों से सच कहना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।

परिवर्तन का युग है इसमें, टूट रहे हैं मूल्य सभी।
आज वही हो रहे उपेक्षित, जो गौरव के साज कभी।।
करता अन्तर्मन को बेधिल, दुर्भावों का हठ हँसना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।

समझाने से कौन‌‌ समझता, सब दिखलावे में उलझे।
मर्यादित होकर जो जीता, कौन यहांँ उसको समझे।।
होड़ लगी हो जब दर्पण में, रोज-रोज सुन्दर दिखना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।

आदर्शों की बातें करना, आदर्शों पर वा चलना।
एक उदाहरण बनकर जीना, दुष्कर होता है कितना।।