बस्ती में सलीम बस्तवी अज़ीज़ी के साहित्यिक और अदबी सफर के साथियों का मिल रहा है भरपूर प्यार और दुलार, ,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 3 अगस्त ।
मेरे पैमाने में हिन्दू भी है और मुस्लिम भी,
कोई बतलाए कि मेरा यह जाम कैसा है ।
जो भी गजलें हैं मेरी आओ सभी ले जाओ,
बस यह बलादो कि मेरा कलाम कैसा है ।।
अनुराग लक्ष्य के संपादक विनोद कुमार हर्षित के साहित्यिक सफर के साथी सलीम बस्तवी अज़ीज़ी पिछले 30 वर्षों से बस्ती की साहित्यिक और अदबी ज़मीन को हमेशा शादबियत बख़्शी है।
इस सफर में मेरे बहुत ही अजीज़ बड़े भाई बस्ती की साहित्यिक गतिविधियों के भीष्म पितामह डॉ राम कृष्ण लाल जगमग जी का भी बड़ा प्यार दुलार और स्नेह मुझे हमेशा मिला है।
इसके साथ ही मेरे दिल के करीब रहने वालों में शाद अहमद शाद, दीपक प्रेमी, अजीत श्रीवास्तव राज़, अफजल हुसैन अफज़ल, सुशील सिंह पथिक, अनवार हुसैन पारसा, कवयित्री और शाइरा अर्चना श्रीवास्तव जी, अजय श्रीवास्तव, नवीन शुक्ला सहित मैं अपने सभी चाहने वालों का मैं तहे दिल से Shukrguzar हूँ, जिन्होंने हमेशा अपना प्यार और दुलार दिया है।
मेरी ख्वाहिश है कि जब तक मेरी सांस चलती रहे तब तक मैं अपने इन्हीं चाहने वालों के साथ मैं अपना साहित्यिक और अदबी सफर तय करता रहूं, इस पैग़ाम के साथ कि,
मैं शायर हूँ मोहब्बत आम करना काम है मेरा,
जहाँ वालों मुझे देखो मोहब्बत नाम है मेरा ।
हर इक दिल हो मोहब्बत से यहाँ लबरेज़ इंसाँ का,
मिटे नफ़रत दिलों से बस यही पैग़ाम है मेरा ।