तुफॉ ने मेरी कश्ती का यूँ रुख पलट दिया, साहिल के साथ साथ किनारे बदल गए, अनीस कुरैशी,,,,,,,


अनुराग लक्ष्य, 27 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
कहते की साहित्य और राजनीति का चोली दामन का साथ होता है। यह एहसास मुझे उस वक्त हुआ, जब मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी मुंबई के मुलुंड में एक मुशायरे की नेज़ामत कर रहा था। जिसमें जनाब अनीस कुरैशी साहब से मेरी मुलाकात हुई
मेरे संचालन में जब अनीस कुरैशी साहब को मैने अपना कलाम पेश करने के लिए उन्हें दावत ए सुखन दी तो एक कोहना मश्क शाइर की तरह उन्होंने अपने कलाम को पेश करते हुए खूब दाद ओ तहसीन हासिल की थी, आज उन्हीं के चुनिंदा ग़ज़लों से एक ग़ज़ल आप तमाम सामयीन तक पहुंचा रहा हूँ।

मौसम बदल गया वो नज़ारे बदल गए
देखो बदलते वक़्त में सारे बदल गए ।

तूफ़ाँ ने मेरी कश्ती का यूँ रुख़ पलट दिया
साहिल के साथ-साथ किनारे बदल गए ।

अब देख कर हमें वो चुराने लगे नज़रें
नज़रें मिलीं तो उनके इशारे बदल गए ।

शिकवा नहीं है ग़ैर का आख़िर वो ग़ैर है
अफ़सोस है ये मुझको हमारे बदल गए ।

रिश्तों पे अब यक़ीन भला कैसे हो यहाँ
जो थे हमारी जान से प्यारे बदल गए ।

अब हाथ की अनीस लकीरें भी मिट गईं
बदला नहीं नसीब, सितारे बदल गए ।

पेशकश सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,