

अनुराग लक्ष्य, 27 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
शहादत से जिन्होंने कर दिया ग़ुलाज़र कर्बल को,
मोहम्मद के नवासों का वही इस्लाम है मेरा,
यजीदी मैं नहीं मैं तो हुसैनी हूँ जहाँ वालों,
शहादत हो अगर मेरी यही ईनाम है मेरा,,,,,
जी हाँ, इसी सच्चाई में जीते हुए बस्ती के मुसलमान भी बीती रात यौम ए आशूरा के दिन ईमाम हुसैन के चाहने वालों ने अस्पताल चौराहा स्थित कर्बला में अपने ग़म का इज़हार करते हुए अपने अपने मुहल्ले के ताज़िए दफ्न करके दरूद ओ सलाम का नज़राना पेश किया।
दोपहर बाद से ही बस्ती शहर के गांधी नगर में मुस्लिम समुदाय के मानने वालों ने ताज़िए निकाल कर सड़कों पर ईमाम हुसैन की शहादत को अपनी खेराज ए अकीदत को पेश करते हुए कर्बला की याद को ताज़ा कर दिया ।
उधर पुरानी बस्ती में परंपरागत तरीके से इमाम हुसैन की याद में निकले जुलूस में सड़कें पूरी तरह जाम हो गईं। अकीदत मंदों का एक जनसैलाब दिखाई दिया। और फिज़ाओं में नार ए तकबीर अल्लाहु अकबर की सदाएं बुलन्द हो गईं।
मुहर्रम के अखाड़ों ने खूब समां बांधा। जिसमें लाठी बल्लम और फरसों के करतब को दिखाते हुए हुसैन के चाहने वालों कर्बला की याद को ताज़ा कर दिया।
देर रात तक इस मुहर्रम के जुलूस में पुलिस प्रशाशन की भूमिका सराहनीय रही।