ग़ज़ल
तमाशा मैं हूँ,ज़माना ये तमाशाई है,
ये बात जा के कहीं अब समझ में आई है।
उस से जल जाए न ख़ुद आपका दामन साहब,
वो आग चुपके से जो आपने सुलगाई है।
तुम्हारे बाद हुई गाँव से रुख़्सत रौनक़,
न अब वो सावनी मंज़र है न पुरवाइ है।
थिरक रही है जवानी तो आज डी.जे.पर,
किसी भी दर पे कहाँ गूँजती शहनाई है।
मुझे ये ख़ौफ़ है मैं डूब न जाऊँ उसमे,
शराबी आँखो में उसके बहोत गहराई है।
वो बात जिसकी ख़बर सारे ख़ास-ओ-आम को है,
वो बात उसने मुझे चुपके से बतलाई है।
नदीम हाल न पूछो हमारा आज के दिन,
खनक है बातों में न आँखों में बीनाई है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥