बर्तनों की आपस में लड़ाई

बर्तनों की आपस में लड़ाई

 

रसोईघर में रात हुई तो

बर्तनों में बहस छिड़ी,

थाली बोली अकड़ दिखाकर—

“सबसे ऊँची मेरी कुर्सी!”

कड़ाही बोली—

“चुप भी रहो तुम,

तेल बिना क्या काम तुम्हारा?

पूड़ी, पकौड़ी मैं बनवाती,

घर-घर गूंजे नाम हमारा!”

तभी तवा गुस्से में बोला—

“ज़्यादा मत इतराओ बहना,

रोटी मुझ पर सिकती है,

सबको पड़ता मुझको सहना।”

चम्मच बोला टन-टन करके—

“तुम सब केवल शोर मचाते,

असली मेहनत मैं करता हूँ,

सबके मुंह तक खाना लाते!”

गिलास बोला सीना तान—

“प्यास बुझाना काम है मेरा,

मेरे बिन सब सूखे-सूखे,

मैं ही सबसे बड़ा सवेरा!”

इतने में कुकर सीटी मारकर

जोर-जोर से चिल्लाया—

“काम सभी का जरूरी होता,

किसने ये झगड़ा फैलाया?”

कोने में बैठा बूढ़ा लोटा

धीरे-धीरे मुस्काया,

“अरे बर्तनों! सीखो कुछ तुम,

मिल-जुल कर ही घर चल पाया।”

तभी सुबह की आहट आई,

मालकिन रसोई में आई,

सब बर्तन फिर शांत हो गए,

जैसे कुछ भी बात न भाई!

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़