माँ का आँचल

शीर्षक- माँ का आँचल

 

माँ का आँचल धूप में जैसे ठंडी छाँव उतर आए,

सूखे मन के आँगन में जैसे सावन गुनगुनाए।

 

जब दुनिया ने ठुकराया, माँ ने सीने से लगाया,

टूटे हुए हर सपने को, उसने फिर जीना सिखाया।

 

उसकी ममता की खुशबू से घर का कोना महकता है,

माँ के होने से ही तो हर दुख छोटा लगता है।

 

रोटी कम हो फिर भी माँ बच्चों को भरपेट खिलाती है,

अपने हिस्से की खुशियों को चुपके से भूल जाती है।

 

माँ की दुआओं से रोशन हर मुश्किल की राह हुई,

उसके चरणों में ही जैसे मेरी सारी चाह हुई।

 

जब भी डर ने घेरा मुझको, माँ ने हिम्मत थाम ली,

अपने आँचल की छाया में हर तकलीफ संभाल ली।

 

ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना कहीं और भगवान मिला,

माँ के झुर्री वाले चेहरे में ही सारा जहान मिला।

 

माँ का आँचल शब्द नहीं, पूरा जीवन होता है,

जिसके सिर पर माँ का हाथ हो, वो सबसे धनवान होता है।

 

स्वरचित/मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़