ग़ज़ल
बात निकलेगी वही,फिर से यही तो डर था,
बस इसी वास्ते सजदे में हमारा सर था।
भूलना चाहे कोई भी तो भुलाए कैसे,
तूने जिस घर को गिराया था ख़ुदा का घर था।
बाजुओं पर जिसे तू बाँध के अम्बर पहुंचा,
क्या कभी तूने ये सोचा कि वो किसका पर था।
घर जलाते हुये मेरा नहीं सोचा तुने,
ठीक बाज़ू में मेरे घर के तेरा भी घर था।
बावजूद इसके नहीं फ़ैसला कुछ हो पाया,
ख़ून से तर था तू और ख़ून से मैं भी तर था।
मेरे मालिक मेरे इस ख़्वाब की ताबीर न हो,
मेरे पैरों में झुका जाने वो किसका सर था।
फिर नदीम आ गये थक हार उसी तेवर में,
मानिये मेरा यकीं मुझको इसी का डर था।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥