बैसाखी
बैसाखी आई; खुशियों की सौगात नई।
खेतों में लहराए; सोना सी फसल।
किसानों के चेहरे; खिल उठे आज।
ढोल नगाड़ों की गूंज; गगन तक।
भांगड़ा गिद्धा नाचे; हर दिल संग।
रबी की फसल कटकर; घर आई।
परिश्रम का मीठा फल; सब पाए।
गुरुद्वारों में गूंजे; पावन कीर्तन आज।
श्रद्धा से झुके; सिर सब जन।
लंगर में मिलती; प्रेम भरी रोटियां।
मेलों में रौनक; छाई हर ओर।
रंग बिरंगे वस्त्र पहन; खुश लोग।
रिश्तों में घुली; मिठास नई सी।
हंसी खुशी बांटे; हर घर आंगन।
प्रकृति भी आज; सजी धजी लगती।
हरियाली ने ओढ़ी; नई चूनर प्यारी।
सूरज भी मुस्काए; सुनहरी किरणें लेकर।
बैसाखी लाती; उमंग, आशा, नव जीवन।
मिलजुल कर सब; मनाएं यह त्योहार।
खुशहाली से भर जाए; देश हमारा।
स्वरचित/मौलिक
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़