ग़ज़ल
आँख दुखने लगी जागते जागते,
रात कट ही गई काटते काटते।
चेहरा चेहरा है अंजान मेरे लिए,
मैं कहाँ आ गया भागते भागते।
एक आदत सी अब पड़ गयी है मुझे,
आसतीं में इन्हें पालते पालते।
उस की तजवीज़ को मनाना ही पड़ा,
थक गया था मैं अब टालते टालते।
एक बूढ़े मगर की ये हालत है अब,
जी रहा है मगर हांफते हांफते।
बस अलाव का ही इक सहारा तो था,
ठंड काटी उसे तापते तापते।
मछलियाँ दूर से मुंह चिढ़ाती रहीं,
थक गये जाल हम डालते डालते।
हर तरफ़ भूख,बदहाली,ग़ुरबत नदीम,
तुम कहाँ आ गये माँगते,माँगते।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥