काव्य: चांदनी रात
चांदनी रात में सपने जागे धीरे,
शांत गगन में चाँद मुस्काए निर्मल।
तारों की चादर झिलमिल करती रहती,
हवा मधुर गीत गुनगुनाती चुपके से।
पेड़ों की छाया लहराए संग-संग,
नदी किनारे चमके चांदी-सी लहर।
रात की नीरवता मन को भाए,
दूर कहीं कोयल सुर सजाए मीठे।
चांद की किरणें धरती सहलाती कोमल,
मन के भीतर उजियारा भर जाए।
खामोशी में भी कहानी कहती रात,
सपनों की दुनिया सजी लगे सुंदर।
आसमान जैसे प्रेम-पत्र लिखता शांत,
हर कोना जगमग जादू-सा लगता।
दिल की धड़कन भी धीमी हो जाती,
रात का आंचल सुकून से भरपूर।
तन्हाई भी साथी बन जाती प्यारी,
चांदनी में यादें खिल उठती चुपचाप।
रात कहे कुछ अनकहे राज पुराने,
सुबह से पहले ये पल ठहर जाए।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़