( ईद मिलन समारोह )
कभी ईदें महकती हैं कभी होली महकती है, मिलें हिंदू मुसलमाँ जब तो यह बोली महकती है, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 23 मार्च
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
बीती शाम धारावी के आंबेडकर सभागार में आयोजित गंगा जमुनी मुशायरा और कवि सम्मेलन में शामिल हुए श्रोता उस वक्त झूमने पर विवश हो गए, जब पुर्वांचल के कोहनूर शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी के शानदार और सफल संचालन में मुशायरा परवान चढ़ा।
इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि वर्तमान विधायिका ज्योति गायकवाड़ की उपस्थित ने माहौल को और भव्य बना दिया।
अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि ज्योति गायकवाड़ ने कहा कि मैं देख रही हूं कि पिछले तीन वर्षों से घायल कानपुरी के संयोजन और मशहूर शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी के सफल संचालन में मुशायरा सम्पन्न हो रहा है। मैं सभी शायर और कवियों को अपनी तरफ से ईद की दिली मुबारकबाद पेश करती हूं। साथ ही यह भी कामना करती हूँ कि जिस तरह ईद के मौके पर आप अपना कीमती समय इस मुशायरे को देते हैं। आगे भी आप का यह सहयोग हमें मिलता रहेगा।
इस मुशायरे और कवि सम्मेलन की अध्यक्षता पत्रकारिता जगत की नायाब हस्ती श्री हरगोविंद विश्वकर्मा ने की । कभी ईदें महकती हैं कभी होली महकती है
मिलें हिंदू मुसलमाँ जब तो यह बोली महकती है।
कोई दुश्मन भी घर आए तो यह महसूस होता है,
कि स्वागत में मेरे आँगन की रंगोली महकती है।।
उपरोक्त पंक्तियों के साथ मुशायरे के संचालक सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने मुशायरे का आगाज़ किया जिसे उपस्थित श्रोताओं ने बेहद सराहा।
तदोपरांत नौजवान शायर साहिल प्रतापगढ़ी ने अपना कलाम,
अल्लाह का मुझपे बड़ा एहसान हो गया,
तूफाँ मेरी कश्ती का निगहबान हो गया।
सुनाकर मुशायरे को नई रंगत दी।
इससे क्रम में मुंबई के संजीदा शायरों में शुमार राजेश उन्नावी ने अपने शानदार और कई खूबसूरत अशआर से सभागार को मंत्र मुग्ध कर दिया। खासकर उनका यह कलाम,
,,, इसका नहीं मलाल वोह कह कर मुकर गया,
जो बात दरमियान थी उसका असर गया।
क्या वक्त आ गया है यह हैराँ हूँ सोच के,
ज़िन्दा तो आदमी है पर एहसास मर गया।।
इसी फेहरिस्त में मुंबई की मशहूर ओ मारूफ शाइरा पूनम विश्वकर्मा ने अपने कई खूबसूरत अशआर से सभागार में रूमानियत की चाशनी बिखेर कर सबके दिलों में उतर गईं, खास कर उनका यह कलाम,
मुहब्बत में ख़सारा हो रहा है,
हमारा बस गुज़ारा हो रहा है।
न बुझती है न पूरी जल रही है,
चरागों में शरारा चल रहा है।।
अपनी बारी आने पर संचालक सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने मुशायरे में अपने कई इंकलाबी अशआर से सभागार में खूब तालियाँ बजवाईं, उनका कलाम,
जो हैं न अहल दुनिया में वोह अक्सर डूब जाते हैं,
बचाने को उन्हें सग़र कोई मीना नहीं आता।
वजह क्या है कि सारी उम्र वोह मंज़िल की चाहत में,
तड़पते हैं तरक्की का कोई ज़ीना नहीं आता । ।
और अंत में अध्यक्षता करते हुए हरिहोविंद विश्वकर्म का कलाम,
,, हम सीधे सादे लोग हैं
नफ़रत के नहीं पुजारी हैं ।
बस प्यार मुहब्बत करते हैं,
दहशत के नहीं पुजारी हैं।।
इनके अलावा घायल कानपुरी, रवि यादव, नईम गोरखपुरी और शबनम ज़िया ने भी अपने अपने कलाम से मुशायरे को नई रंगत और नई ऊंचाई दी ।