शीर्षक : कर्म दंड
कर्मों की धरा सब कुछ संजोती है,
मौन रहकर भी न्याय ही बोती है।
कोई पगचिन्ह कभी खोता नहीं,
समय का लेखा कभी सोता नहीं।
जो छाया बनकर दूसरों को डराता,
वही अंधेरा उसे घेरने आ जाता।
जो छल से सीढ़ी ऊपर चढ़ता है,
वही सत्य से नीचे उतरता है।
कर्म दंड कोई क्रोध नहीं होता,
यह आत्मा का ही बोध होता।
जो पीड़ा जग में तुम बिखेरोगे,
वही पीड़ा बनकर तुमको घेरेगी।
समय का तराजू झूठ नहीं तौलता,
हर सत्य को सही रूप में खोलता।
अहंकार का दीप जल्दी बुझ जाता,
विनम्रता का प्रकाश अमर हो जाता।
हर कर्म की प्रतिध्वनि लौटती है,
जीवन की दिशा स्वयं मोड़ती है।
इसलिए कदम सोचकर बढ़ाना तुम,
अपने ही भाग्य को ना सताना तुम।
कर्म दंड से कोई बच नहीं पाता,
सत्य अंत में मुस्कुराकर आता।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
राजिम जगदलपुर
छत्तीसगढ़