मनमौजी — लघु कथा

🌿 मनमौजी — लघु कथा 🌿

 

एक छोटा-सा गाँव था, और उसी गाँव में रहता था घुटकुम्रा।

बचपन ही उसकी किस्मत पर भारी पड़ गया—पिता का साया उठ चुका था और माँ दूसरों के घर झाड़ू–पोछा कर उससे जीवन चलाती थी।

सीधी-सादी, शांत स्वभाव की वह माँ अपने दस वर्षीय बेटे को भरसक संभालने की कोशिश करती, पर घुटकुम्रा तो मनमौजी था।

 

माँ कुछ कहती, पर वह अपनी ही दुनिया में मग्न रहता—

मित्र मंडली संग दिन भर गुल्ली-डंडा ही खेलते रहना उसकी आदत थी।

गाँव वाले भी टोकते—

“अरे घुटकुम्रा! तेरी माँ बीमार पड़ी है… कुछ मदद कर दे।”

 

पर वह समझ ही कहाँ पाता—अभी तो वह खुद भी बच्चा था।

 

धीरे-धीरे बीमारी बढ़ती गई।

इलाज न होने के कारण एक दिन माँ भी दुनिया छोड़ गई।

अब वह सचमुच अकेला रह गया।

 

गाँव वालों ने दया दिखाई—

“बेटा, सारे बच्चे रोज़गार की तलाश में दूसरे गाँव जाते हैं, तू भी चला जा।”

किसी ने मोटी रोटी, किसी ने कच्चा प्याज़, नमक–मिर्च पोटली में बाँधकर उसके गले में कलवा बांध दिया।

घुटकुम्रा अपनी मनमौजी चाल में गाते-बजाते दूसरे गाँव की ओर निकल पड़ा।

 

कुछ घंटों बाद उसे तेज़ प्यास लगी।

एक बूढ़ी अम्मा के घर के बाहर खड़े होकर उसने पानी माँगा।

अम्मा ने आवाज़ लगाई, और भीतर से एक सुंदर कन्या पानी लेकर आई।

लेकिन उसने मुस्कुराते हुए कहा—

 

“पानी पीने से पहले एक पहेली बुझानी होगी।

तैयार हो?”

 

घुटकुम्रा ने उत्साहित होकर सिर हिला दिया।

 

पहेली:

जंगल में मायका, गाँव में ससुराल,

गाँव आई दुल्हन, उठ चला बवाल।

 

घुटकुम्रा ने थोड़ी देर सोचा…

फिर झट से उत्तर दिया—

“कुड़ी… यानी पानी की बाल्टी!”

 

कन्या मुस्कुरा उठी।

उत्तर सही था।

उसे पानी पिलाया गया।

 

बूढ़ी अम्मा के पास बेटा नहीं था, सिर्फ यही एक बेटी।

वह घुटकुम्रा की समझ, सादगी और चंचलता से खुश हुईं।

धीरे-धीरे उसे अपने घर में रहने दिया, और कुछ समय बाद अपनी बेटी का विवाह उसी से कर दिया।

 

अम्मा ने अपना सारा राज-पाट, सारी ज़िम्मेदारियाँ, उसी मनमौजी बच्चे के हाथ सौंप दीं।

 

और इस तरह—

घुटकुम्रा की मनमौजी ही उसकी सीख साबित हुई।

एक फक़ीर जैसे जीवन से शुरू होकर वह राजा बन गया…

पर दिल उसका वहीं रहा—भोला, निष्कपट, बालक जैसा।

 

 

 

ज्योती कुमारी

नवादा (बिहार)