अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस – ज्योती वर्णवाल 

*दिनांक:- 20/ 1 /2026

 

*दिन – मंगलवार

 

*विषय – अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस*

 

*विधा- कविता*

 

*शब्द-सीमा – 12 – 16 पंक्तियां*

 

पिता, बेटा, भाई, पति या दोस्त, हर रूप में वो फर्ज निभाता है,

एक कोमल सा मन लेकर, वो दुनिया के सामने कठोर बन जाता है।

कहा जाता है ‘मर्द को दर्द नहीं होता’, पर ये बात महज़ एक अफ़साना है,

बंद कमरों और बाथरूम की सिसकियों में, उसका दर्द बहुत पुराना है।

बचपन की सजा में क्लास के बाहर, वो धूप में चुपचाप खड़ा रहा,

स्कूल की विदाई वाली फोटो में भी, वो लड़कियों के पीछे खड़ा रहा।

बहन की शादी की भागदौड़ हो, या पत्नी को बस की सीट दिलाना,

खुद खड़े रहकर खिड़की पकड़, उसने सीखा है अपनों का बोझ उठाना।

माँ के हाथों के भारी थैले, दोनों हाथों में थामे वो साथ चलता है,

ऑपरेशन थिएटर के बाहर घंटों खड़ा, वो दुआओं में हर पल पिघलता है।

बच्चे के जन्म की आहट सुनने को, दरवाजे के बाहर वो खड़ा रहा,

जिम्मेदारियों की लंबी कतार में, वो हमेशा सबसे आगे अड़ा रहा।

माँ की अंतिम विदा पर भी, जलती लकड़ियों तक वो अडिग खड़ा रहा,

अश्रु बहाते हुए गंगा के शीतल जल में, वो यादों का बोझ लिए खड़ा रहा।

ताउम्र खड़ा रहता है जो सबकी खातिर, उसका भी सम्मान जरूरी है,

पुरुष के बिना इस सृष्टि की, हर खुशी और हर कहानी अधूरी है।

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)