शीर्षक: यादों की सुनहरी गुड़िया और पापा का कोट(लघु कथा)

शीर्षक: यादों की सुनहरी गुड़िया और पापा का कोट(लघु कथा)

 

मेरे बचपन की स्मृतियाँ किसी अनमोल पिटारे जैसी हैं। माँ-बाबा की मन्नतों के बाद जब मैं आई, तो ‘गुड़िया’ और ‘ज्योति’ बनकर सबकी लाड़ली हो गई। घर में हम भाई-बहनों—बंटी, पूजा, रोशनी, बॉबी और प्रीति की अपनी एक अलग ही दुनिया थी। हमारे आँगन का वह मज़बूत झूला और पटना से आया मेरा वह ‘वाकर’ (चलाने वाली गाड़ी), आज भी आँखों के सामने घूम जाते हैं। उसी वाकर का सहारा लेकर हम सब भाई-बहनों ने अपने नन्हे कदम ज़मीन पर टिकाना सीखा था।

बचपन का सबसे मज़ेदार किस्सा दुर्गा पूजा की नवमी का है। उन दिनों त्योहारों का उत्साह ही अलग होता था। उस शाम मेले में जाने की तैयारी हो रही थी, और मैंने व किरण ने कुछ अलग करने की ठानी। हम दोनों ने अपने-अपने पापा के शर्ट-पैंट पहनने का फैसला किया। मैंने तो बड़े चाव से पापा की शादी वाला कोट-पैंट निकाल लिया। वह मुझ पर कितना बड़ा और ढीला रहा होगा, यह सोचकर आज भी हँसी आती है! लेकिन उस वक्त उस कोट को पहनकर मेले में घूमना किसी राजकुमारी के ताज पहनने जैसा गर्व का अहसास था।

मेले की उन गलियों में हम ‘स्टेशन-स्टेशन’ भी खेला करते थे। दो सीटों वाली गाड़ी में बैठकर हम कहते— “लो, पटना आ गया…उखड़ा आ गया!” खेल-खेल में ही मैंने अपनी छोटी बहन को सँभालना और माँ की तरह उसकी देखभाल करना सीख लिया था।

स्कूल जाने के दिनों में छोटे फूफाजी मेरे लिए एक सुंदर चाभी वाली गुड़िया लाए थे जो पटरी पर चलती थी। आज फूफाजी नहीं रहे, पर उनकी वह गुड़िया और अपनों का वह निस्वार्थ प्यार आज भी दिल में ताज़ा है।

अजीब बात है न, बचपन में हमें इस बात की फिक्र नहीं थी कि पापा का बड़ा सा कोट पहनकर हम कैसे लग रहे हैं। आज के दौर में तो हम बस इसी उलझन में जीते हैं कि “लोग क्या कहेंगे”। काश! हम फिर से उसी बचपन की बेफिक्री में लौट पाते, जहाँ खुशियाँ बड़ी-बड़ी गाड़ियों में नहीं, बल्कि लकड़ी के झूलों और पापा के पुराने कोट-पैंट में बसी थीं।

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा(बिहार)