शायद वो सही था – मधु गुप्ता

शायद वो सही था,

विधा-कविता

शायद वो सही था,

हमने ही उसको ना पहचाना था।

रूठा था वह हमसे बेहद,

क्योंकि हमने उसको ताना मारा था…।।

 

होठों पर दबी आह को उसकी,

यह मन बैरी ना जाना था।

यह सोचकर बहुत शर्मसार हुए हम,

की यह कैसा मंजर हमने गढ़ डाला था…।।

 

ठीक कि हम कुछ कह पाते,

सही गलत समझा पाते।

उसने भरी मेहफ़िल में हमको,

अपनी नज़रों से उतारा था…।।

 

हो गए वहीं पर पत्थर हम,

चोट लगी थी सख्त समंदर।

फिर बड़े ना आगे ना पीछे मुड़ पाए,

यह कैसा घोर सूना उजियारा था…।।

 

मिला कभी तो उससे पूछेंगे,

कि क्यो हमने दिल तेरा इतना जोर दुखाया था।

की एक भी मौका दिया नहीं,

क्या किसी अपने ने किसी अपने का दिल ऐसे भी दुखाया था।

मधु गुप्ता अपराजिता