🪁 शीर्षक — पतंग और डोर
विद्या-कविता
मेरा नन्हा-सा मेरा बेटा जब दादाजी संग बाज़ार को जाता था,
घर के बाजू वाली दूकान से रंग-बिरंगी पूँछ वाली पतंगें लाता था।
दादाजी हौले से पूछते— “कौन-सी पतंग लेनी है रे मेरे राजकुँवर?”
वह उछलकर कहता— “पूँछों वाली… बस वही जो उड़ जाए सबसे ऊपर।”
सर्दी की धूप में दोनों साथ खड़े पतंग उड़ाने की कला भी सीखते थे,
डोर पकड़ते–पकड़ाते हँसी के संग अपने ही बचपन को जीते थे।
दिन बीते… मौसम बदला… पर अचानक एक सन्नाटा घर में उतर आया,
बीमारी और उम्र की थकान ने दादाजी को भगवान के पास बुलाया।
बेटा सहम गया… सदमे में खो गया… रातों में चौंककर उठ बैठता,
सपनों में देखता— “मेरी पतंग की डोर ऊपर जा रही है… ऊपर जा रही है…” कहता।
कहता— “मैं दादाजी से बातें कर रहा हूँ… देखो न माँ, वह पास ही खड़े हैं”,
उसकी यह हालत देख मैं माँ घबरा जाती— आँसू ढलकते, मन में दर्द बड़े हैं।
सीने से लगाकर कई साल मैंने उसे इस दुःख की गिरह से निकाला है,
डोर में उलझी उसकी भावनाएँ धीरे-धीरे समय ने ही संभाला है।
आज भी जब कोई पतंग आसमान में लहराकर ऊपर-ऊपर जाती है,
तो दादाजी की मुस्कान, उनकी सीख, उनकी गोद… सब आँखों में तैर जाती है।
पतंग और डोर के सहारे यादों का ये आसमान आज भी रंग भरता है,
और मैं— बहू होकर भी, पिता समान अपने ससुर जी को हर क्षण याद करती रहती हूँ। 🙏
ज्योती कुमारी ✍️
नवादा (बिहार)
स्वरचित मेरी रचना—