कुदरहा, बस्ती। सुख और दुख मानव जीवन का प्रारब्ध बताया जाता है। मानव जीवन मे लाभ- हानि, मान -अपमान प्रारब्ध के अनुरूप मिलता है। कर्म प्रधान है इसलिए हमे जीवन का हर क्षण अच्छे कार्यो मे लगाना चाहिए ।
यह सद्विचार से आये कथा वाचक सत्यम सांकृत महाराज ने छरदही मे चल रही संगीतमयी भागवत कथा के तीसरे दिन ब्यास पीठ से प्रवचन सत्र मे ब्यक्त किया। उन्होंने संतों का लक्षण बताया कि सरल स्वभाव, जिसका हृदय करुणा से भरा हो, क्षमाशील सम्भाव रखने वाला, हमेशा लोक कल्याण का कार्य करने वाला ही संत है और मानस में बाबा तुलसीदास जी ने अरण्य कांड मे लिखा है कि “संत हृदय नवनीत समाना “ कहा कविन परि कहे न जाना।अर्थात जिस प्राणी के अंदर यह गुण विद्यमान है वहीं संत है और यह सत्संग के माध्यम से ही संभव है।
उन्होंने कथा को विस्तार देते हुए कहा कि एक दिन राजा परीक्षित शिकार करने जंगल में गए थे। वहां भूख प्यास से व्याकुल होकर शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे और वह जल मांग रहे थे जब उनको जल नहीं मिला तो क्रोध में आकर बगल में पड़ा मरा हुआ सर्प अपने धनुष के तीर से उठाकर शमीक ऋषि के गले में डाल दिए। ऋषि पुत्र नदी में स्नान कर रहे थे सभी ऋषियो ने उन्हें जा करके बताया कि तुम्हारे पिता जी के गले में राजा परीक्षित ने मरा हुआ सर्प डाल दिया है। क्रोध में आकर ऋषि पुत्र ने एक अंजुली जल लेकर के राजा को श्राप दे दिया और कहा कि जाओ वही मरा हुआ सर्प आज के सातवें दिन तुम्हें डस लेगा। जिसके कारण तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। जैसे ही राजा अपने महल में जाकर मुकुट को उतारा तो वह अपने किए गए कर्मों पर पश्चाताप करने लगे कि मैंने ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डालकर घोर अपराध किया है मुझे तो इसकी सजा मृत्युदंड ही मिलना चाहिए। तभी ऋषि के अनुयाई पहुंच गए और बताने लगे कि आज के सातवें दिन आपकी मृत्यु हो जाएगी। राजा ने कहा मुझे मेरे इतने बुरे कर्मों का ऐसा ही दंड मिलना चाहिए था। राजा परीक्षित आनन-फानन में अपने पुत्र जन्मेजय को सिंहासन पर बैठा कर गंगा के तट पर पूजा अर्चना करने चले गए। फिर ऋषि सौनक को अपने पिछले किए गए कर्मों को बताया और पूंछा कि किए गए बुरे कर्मों का पश्चाताप कैसे किया जाए। जिनको मरने में सिर्फ सात दिन का समय शेष बचा हो तब सुखदेव जी ने प्रेम पूर्वक उनको समझाते हुए कहा कि आप श्रीमद्भागवत कथा का सात दिनों तक रसास्वादन करिए जिससे आपके बुरे कर्मों से छुटकारा मिल जाएगा। राजा परीक्षित ने आनन-फानन में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन कर सात दिनों तक उसका रसपान किया कि जिससे हमारे बुरे कर्मों से मुक्ति मिल सके।
मुख्य अजमान हरेंद्र प्रसाद दुबे, वेदमणि दुबे, अभिषेक कुमार, राकेश, बाबू राम दुबे, राम भारत, अजय कुमार, आनंद दुबे, हरिद्वार प्रसाद, राजबहादुर, जंग बहादुर गौड सहित तमाम भक्त मौजूद रहे।