ओ३म्
“प्रसिद्ध आर्ष गुरुकुल पौंधा-देहरादून के यशस्वी आचार्य डा. यज्ञवीर व्याकरणाचार्य”
===============
श्री मद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौंधा-देहरादून देश का आर्ष व्याकरण के अध्ययन-अध्यापन का प्रसिद्ध गुरुकुल वा केन्द्र है। यह गुरुकुल अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण कर 26वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। गुरुकुल के प्रधान आचार्य डा. धनंजय आर्य जी हैं। श्री चन्द्रभूषण शास्त्री, डा. शिवदेव आर्य एवं गुरुकुल के अन्य आचार्य, शिक्षक, छात्र, पूर्व छात्र एवं सेवकजन आचार्य धनंजय जी का सहयोग करते हैं जिससे यह गुरुकुल आर्ष व्याकरण व अन्य विषयों के अध्ययन-अध्यापन का एक प्रसिद्ध केन्द्र बन गया गया। इस गुरुकुल में व्याकरण आदि का ज्ञान कराने वाले प्रमुख आचार्य डा. यज्ञवीर व्याकरणाचार्य जी हैं। दिल्ली शिक्षा विभाग के एक इण्टर कालेज से प्रधानाचार्य के पद से अपनी सेवानिवृति सन् 2010 के बाद से आपने गुरुकुल पौंधा में रहकर यहां ब्रह्मचारियों को व्याकरण आदि विषयों का अध्ययन कराना आरम्भ किया था। तब से आप गुरुकुल में रहकर विद्यार्थियों को अध्ययन करा रहे हैं। आपके पढ़ाये विद्यार्थी विश्वविद्यालय स्तर की संस्कृत की अनेक प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेते हैं और प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त कर गुरुकुल के सम्मान वा प्रतिष्ठा में वृद्धि कर रहे हैं।
डा. यज्ञवीर व्याकरणाचार्य जी का जन्म दिनांक 15-8-1948 को रोहतक की साम्पला तहसील के एक ग्राम किसरैटी (शुद्ध शब्द केशर तट्टी) में पिता श्री भीम सिंह जी और माता श्रीमती नन्हीं देवी जी से हुआ था। आपकी प्राइमरी स्कूल तक की शिक्षा ग्राम की पाठशाला में ही हुई। उसके बाद आप गुरुकुल झज्जर में प्रविष्ट हुए और वहां से अध्ययन पूरा किया। आपने गुरुकुल झज्जर की परीक्षाओं के अतिरिक्त गुरुकुल ज्वालापुर, मेरठ कालेज तथा पंजाब विश्वविद्यालय की अनेक परीक्षायें भी दीं। आपने पंजाब विश्वविद्यालय से आचार्य की उपाधि प्राप्त की है। आचार्य डा. यज्ञवीर जी का विवाह सन् 1971 में हुआ था। आपके एक पुत्र व तीन पुत्रियां हैं।
आचार्य डा. यज्ञवीर जी ने दिल्ली सरकार के कक्षा 12 तक के एक विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। वह प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी रहे हैं। उनकी सेवानिवृति वर्ष 2010 में हुई थी। गुरुकुल झज्जर के अध्ययन काल में डा. यज्ञवीर जी की आचार्य हरिदेव जी जो बाद में संन्यास लेकर स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती बने हैं, से गहरी मित्रता रही है। सेवानिवृति के बाद आपने अपनी विद्या के विस्तार एवं उपयोग के लिये देहरादून के पौंधा गुरुकुल को आचार्य के रूप में अपनी सेवायें दीं। तब से आप गुरुकुल के छात्रों को संस्कृत व्याकरण एवं इतर संस्कृत विषयों को पढ़ा रहे हैं। आचार्य जी ने गुरुकुल के निकट ही अपना एक निजी आवास भी बनवा रखा है। गुरुकुल में भी निवास के लिये आपका कक्ष है। आप अपनी सुविधानुसार दोनों स्थानों पर निवास करते हैं।
आचार्य यज्ञवीर जी ने ऋषि दयानन्द जी के संस्कृत के व्याकरण ग्रन्थ उणादि कोष का दो भागों में भाष्य किया है जो गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली से उपलब्ध होता है। आपकी एक पुस्तक ‘‘ओम लहरी” है। आचार्य जी ने आचार्य मेधाव्रत जी के उपन्यास कुमुदनी चन्द्र पर संस्कृत व हिन्दी में टीका लिखी थी। आर्यसमाज के उनके किसी मित्र जो एक गुरुकुल के आचार्य हैं, उन्होंने अपने छात्रों को पढ़ाने के लिये वह उनसे ली थी परन्तु उन्हें लौटायी नहीं है। इस पुस्तक की आचार्य जी को खोज करनी चाहिये और किसी प्रकाशक द्वारा इसका प्रकाशन किया जाना चाहिये जिससे आचार्य मेधाव्रत जी की पुस्तक पर आचार्य जी के भाष्य का लाभ संस्कृत के वर्तमान एवं भावी छात्रों को मिल सके। यह भी बता दें कि आचार्य यज्ञवीर जी संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में कविता करने में समर्थ हैं।
इन पंक्तियों के लेखक की आचार्य जी से सन् 2010 से ही निकटता है। आचार्य जी हमें छोटे भ्राता की तरह स्नेह देते हैं। हमारे निजी कार्यक्रमों में हमारे निवास पर भी अतिथि रूप में पधारे हैं। एक बार हम आचार्य जी के साथ देहरादून से दिल्ली की रेल यात्रा कर गुरुकुल गौतमनगर के वार्षिक उत्सव में गये थे। वहां दोनों एक ही कक्ष में दो दिनों तक रहे थे। तब आचार्य जी से अनेक विषयों पर विस्तार से बातचीत करने का अवसर मिला था। आचार्य जी के साथ ऐसा लगता ही नहीं है कि यह वेद एवं व्याकरण के बड़े विद्वान हैं। साधारण बन्धुओं की तरह प्रेम से बात करते हैं और हंसी मजाक भी करते हैं। आचार्य जी फेस बुक पर भी हमसे जुड़े हैं और हमारे लेखन को प्रोत्साहित करते रहते हैं।
देहरादून के वैदिक विद्वान डा. कृष्णकान्त वैदिक शास्त्री आचार्य डा. यज्ञवीर जी को अपना गुरु वा आचार्य बताते हैं। आचार्य जी ने डा. कृष्णकान्त जी को डेढ़ वर्ष व्याकरण एवं निरुक्त पढ़ाया है। इससे पहले वैदिक जी ने आचार्य डा. यज्ञवीर जी से सांख्य एवं योगदर्शन भी पढ़ा है। अब भी वह आचार्य जी से पढ़ते हैं तथा व्याकरण विषयक जो भी शंका होती है उसे दूरभाष करके पूछते हैं। वैदिक जी आजकल ऋषि दयानन्द जी के ऋग्वेद वेदभाष्य पर कार्य कर रहे हैं। ऋषि भाष्य में जो संस्कृत के पदार्थ व हिन्दी पदार्थ में अन्तर है, हिन्दी पदार्थ व भावार्थ में जो संस्कृत भाग का अनुवाद होने से छूट गया वा अन्यथा लिखा गया है उसे डा. कृष्णकान्त जी शोध कर शुद्ध कर रहे हैं। इसके साथ ही वह मन्त्रों के अंग्रेजी के पदार्थ व भावार्थ भी एक ही स्थान पर अर्थात् एक मन्त्र के संस्कृत, हिन्दी व अंग्रेजी अन्वय, पदार्थ व भावार्थ आदि को एक ही स्थान पर साथ साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। डा. कृष्णकान्त जी ने ऋग्वेद के प्रथम मण्डल जिसमें दो हजार से अधिक मन्त्र हैं, उस पर कार्य समाप्त कर लिया है। उनका यह कार्य चार खण्डों में पूरा हुआ है जिनमें तीन खण्ड वेबसाइट ‘वैदिक स्क्रीप्चर्स’ पर उपलब्ध है। कार्य पूरा हो जाने पर सभी खण्डों का पुस्तक रूप में प्रकाशन किया जायेगा। वैदिक जी की इस समय आयु लगभग 75 वर्ष है। उनका प्रयास है कि वह ऋषि दयानन्द के समस्त वेदार्थों पर कार्य करें जिससे हिन्दी अनुवाद सहित अन्य सभी कमियां व अशुद्धियां दूर हो जायें और पाठकों को ऋषि दयानन्द के वेद मन्त्रों के शुद्ध अर्थ हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी में पढ़ने को मिल सकें। डा. कृष्णकान्त वैदिक जी क्योंकि आचार्य यज्ञवीर जी के शिष्य रहे हैं और आज भी हैं, इसलिये हमने इस प्रकरण को इस लेख में समाविष्ट किया है।
आचार्य जी की आयु 75 वर्ष हो रही है। वह प्रायः स्थस्थ हैं और छात्रों को प्रतिदिन अध्ययन कराते हैं। हम आचार्य जी के अच्छे स्वास्थ्य की ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और उनकी दीर्घायु की कामना करते हैं। डा. धनंजय आर्य और आचार्य चन्द्रभूषण शास्त्री जी गुरुकुल में उनकी प्रशंसनीय सेवा कर रहे हैं। इनका भी धन्यवाद है। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य