
अनुराग लक्ष्य, 10 फरवरी
मुम्बई संवाददाता।
मासिक काव्य गोष्ठियों की श्रृंखला में साहित्यिक संस्था , काव्य सृजन, की 143 वीं काव्य गोष्ठी ऐरो एकेडमी साकीनाका में आयोजित की गई। जिसकी अध्यक्षता गीतों के राजकुमार राम जी कनौजिया ने की, बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे सेना के सेवानिवृत अधिकारी श्री रंजीत जाधव जी । साथ ही काव्य गोष्ठी का सफल संचालन शायर एवम् गीतकार सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने किया, जिसे श्रोताओं ने बेहद सराहा।
काव्य गोष्ठी का शुभारंभ काव्य सृजन परिवार के रूह ए रवाँ ,आत्मिक, श्री धर मिश्र के सरस्वती वंदना के साथ हुई, तदोपरांत ताज मुहम्मद सिद्दीकी ने अपनी ग़ज़ल के शेर,
,, वक्त जो पास तुम्हारे है, गनीमत समझो,
मोल दुनिया में नहीं जिसकी वोह दौलत समझो,, सुनाकर भरपूर दाद ओ तहसीन हासिल की। इसी क्रम मे शायर हीरा लाल ,हीरा, ने अपनी ग़ज़ल के शेर, ,, जीस्त का आखिरी सिला मिट्टी, आदमी का है दायरा मिट्टी, तन पे इतना गुमान क्यों आखिर, होगी मिट्टी में ही फना मिट्टी,, सुनकर अपनी साहित्यिक ऊर्जा को दर्शाया।
इसी तरह जय प्रकाश मिश्र की रचना शिक्षक सुरेन्द्र कुमार तिवारी ने सुनाकर अपनी मौजूदगी का भरपूर एहसास कराया। उनकी पंक्तियाँ ,
,,, संगीत की सरिता, मधुर मंदाकिनी,
घोलती शीतल मधुर रस चांदनी,,
इसी तरह कवि लल्लन गुप्ता ने,
,,,इंसान बड़ा नहीं वक्त बड़ा होता है, उम्र बड़ी नहीं तजुर्बा बड़ा होता है,, सुनाकर काव्य गोष्ठी को एक नई रंगत दी।
इसी तरह कवि शिव नारायण यादव की रचना कुछ इस तरह रही,
,,, एक अजीब पहली है ज़िंदगी, सबके साथ होते हुए भी अकेली है जिंदगी,,
इसी तरह कवि ओम प्रकाश तिवारी ने वसंत पर अपनी मार्मिक रचना सुनकर खूब प्रशंसा बटोरी इन पंक्तियों के साथ,
,, सुख गईं कलिया बिखर गए कांटे, फिर सुगंध आने का राज़ क्या सखी। करते नहीं झंकृत जो मन के तार तार, गीत गुनगुनाने का राज़ क्या सखी।।
इसी तरह कवि गुरु प्रसाद गुप्ता ने अपनी रचना, ,, माँ की दुआएं दोस्तों से मन्नत से कम नहीं, माँ साथ हैं तो ज़िंदगी जन्नत से कम नहीं,,सुनकर अपनी उत्कृष्टा का परिचय दिया। इसी क्रम मे आत्मिक श्री धर मिश्र ने अपनी रचना, ,,मन करने लगे नर्तन कीर्तन, इन्द्रियां अंतर्मुख रहें मगन, द्वारा अपनी विशेष प्रतिक्रिया से श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित किया।
संचालन कर रहे शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने अपने दर्जनों कलाम से सभागार को खूब रोमांचित किया, खासकर यह पंक्तियाँ कि,
,, तुम अपनी पश्चिमी तहज़ीब की नंगी नुमाइश में, मेरी सीता और मरियम की है जो पहचान मत मांगो, निकल कर महल से जाए न कोई राम फिर वन में,
तुम अपने स्वार्थ में ऐसा कोई वरदान मत मांगो ,,
और, अंत में अध्यक्षता कर रहे गीतकार राम जी कनौजिया का कलाम भी खूब पसंद किया गया इन पंक्तियों के साथ,
,,, लगा था कुंभ नहाने गए थे चल करके, कई शहरों से कई गांव से निकल करके, मची भगदड़ तो हुआ जान बचाना मुश्किल, न जाने कितने मारे पांव से कुचल कर के,,
काव्य गोष्ठी के अन्त में कवि ओम प्रकाश तिवारी ने सभी का आभार व्यक्त किया।