गुरु गोरखनाथ का महत्त्व-नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि विक्रम संवत की दसवीं शताब्दी में भारतवर्ष के महान गुरु गोरखनाथ का आविर्भाव हुआ। शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमा मंडित महापुरुष भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाए जाते हैं। भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योग मार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग में सबसे बड़े नेता थे। उन्होंने जिस धातु को छुआ वही सोना हो गया। दुर्भाग्यवश इस महान धर्मगुरु के विषय में ऐतिहासिक कहे जाने लायक बातें बहुत कम रह गई है।
जिस योगसाधना को निर्गुण भक्ति धारा के कवि कबीर आदि ने अपनाया उसको स्थापित करने का श्रेय गोरखनाथ को दिया जाता है। उनका मानना था कि जब तक शरीर और उसकी इंद्रियां अपने बस में नहीं लाई जाती, प्राणों के नियमन पर पूर्ण अधिकार नहीं प्राप्त होता है तथा अपनी चित्तवृत्तियां निरुद्ध नहीं हो जाती, तब तक वह निर्मल आत्म तत्व हमारे अंतःकरण में स्पष्टता प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता। योग साधना का मुख्य ध्येय किसी प्रकार चित्तवृत्तियों की बर्हिमुखता में परिणत करना है। जिसके द्वारा साधक के सभी भाव, ज्ञान एवं कर्म एक आत्म तत्व की ओर केंद्रीभूत हो जाए। उसके जीवन में साम्य एवं शांति आ जाए और वह पूर्ण आत्मनिष्ठ हो जाए। इस प्रकार योग की प्रत्येक क्रिया प्रत्यक्ष प्रमाणों पर आश्रित है किंतु ज्ञानीगण वस्तुतः शास्त्रीय वाक्यों के विनिश्चय में ही आस्था रखा करते हैं। इस प्रकार योग साधना जो केवल शास्त्रों की विषय वस्तु थी उसे प्रत्यक्ष रूप से इन्होंने आम जनमानस के सामने प्रकट किया। इसके माध्यम से उन्होंने काया शोधन तथा संयत जीवन यापन आदि पर विशेष बल देते हुए कहा है कि इन साधनाओं की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है। गुरु गोरखनाथ को योग साधना का लक्ष्य ब्रह्म की उपलब्धि में सहायता करना है और उनकी लोक सेवा का भाव भी उसी से सिद्ध होता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने शोध प्रबंध नाथ संप्रदाय में स्पष्ट कहा है कि हिंदू धर्म, इस्लाम या ईसाईयत की तरह संगठित धर्म नहीं है। मनुष्य की प्रकृति में विविधता मिलती है अतः वह धर्म भी इस विविधता को महत्व प्रदान करता है।‌ यही कारण है कि हम योग साधना की अनेक मार्ग पाते हैं। अनेक होकर भी इस साधना का मन्यतव्य एक ही होता है। कर्मयोग राजसी प्रवृत्ति वालों के लिए है, भक्ति योग भाव प्रवण व्यक्तियों के लिए है, तो ज्ञान योग तीक्ष्ण बुद्धि वालों के लिए है। इन योग परंपराओं की एक विकसित परंपरा मिलती है। लेकिन गोरखनाथ का समय आते-आते इन परंपराओं में काफी विकृतियां आ गई थी। ऐसे में उन्होंने इन परंपराओं की मौलिकता को बरकरार रखते हुए इसमें जो भी विकृतियां आ गई थी उसे सुधारा और नाथ संप्रदाय का अंग बनाया। जो चीजें सुधार से परे थी उसे स्पष्ट रूप से बाहर रखा। यह योगी के लिए शील का होना बहुत जरूरी मानते हैं। यह एकमात्र गुण है जो योगी का भूषण बनता है और उसे शुद्ध करता है-
सहजसील का धरै सरीर।
सो गिरती गंगा का नीर।।
गृहस्थ जनन को गोरखनाथ एक दयनीय समूह मानते हैं। एकबार गृहस्थ बन जाने के बाद मनुष्य सदैव ज्ञान प्राप्त करने से दूर हो जाता है –
गिरह होय करि कथै ग्यांन, अमली होय करि धरै ध्यान।
बैरागी होय करै आसा,नाथ कहै तीनों षासा पासा।।
सामाजिक न्याय, समानता की बात करके हम जिन सामाजिक रूढ़ियों तथा पाखंडों के खण्डन की बात पर आज जोर दे रहे हैं गुरु गोरखनाथ ने अपनी परंपरा में इसे पहले से स्थापित कर दिया था। विभिन्न कर्मकांडों के गायन वाचन के आधार पर जो श्रेष्ठता थी उसका उन्होंने खंडन करके समता पर जोर दिया है। उन्होंने ऊंचे-ऊंचे आसनों पर बैठकर बकवास करने वाले उपदेशको की नब्ज पकड़ ली थी। सिर्फ शास्त्र और पोथी के बल पर अर्जित की गई महानता के ढोल के पोल वे जान चुके थे। इसीलिए उन्होंने ज्ञान और उपदेश को आचरण में उतारने की चुनौती पेश किया। उनके समय पर धर्म और अध्यात्म के नाम पर चारों तरफ पाखंड का बोलबाला था। लोगों की कथनी और करनी में काफी भेद था। गोरखनाथ ने इस सर्वव्यापी पाखंड और संस्कृति को चुनौती दिया। उन्होंने उस पाखंड पर कुठाराघात किया है-
कथणी कथै सो विष बोलिए,वेद पढ़े सो नाती।
रहणी रहे तो गुरु हमारा,हम रहता का साथी।
रहता हमारे गुरु बोलिए,हम रहता का चेला।
मन माने तो संगि फिरै,न हितर फिरै अकेला।।
उनके इस प्रतिरोध की परंपरा आगे चलकर एक मूल मंत्र बन गया।कबीर दास ने इसकी महिमा को स्वीकार करते हुए लिखा है कि कथणी कथी तो का का भया जे करणी ना ठहराइ, कालबूत के कोट ज्यू,देखत हि दहि जाइ। न केवल कबीर वरन् सगुण भक्ति धारा के कवि तुलसीदास ने भी कथनी करनी की एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया है पर उपदेश कुशल बहु तेरे, ये आचरहिं ते नर घनेरे।
इस संप्रदाय में गुरु को अति विशिष्ट स्थान दिया गया है। गुरु के बिना कोई भी मनुष्य सिद्धि को नहीं प्राप्त कर सकता है। गोरखबानी में लिखा है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिल सकता है-
गुरु की यै गहिला निगुरा न रहिला।
गुरु बिज्ञ ग्यांन पाईला रे भाईला।।
गोरखनाथ ने अनेक पदों में अपने गुरु मत्स्येंद्रनाथ को अनेक संबोधनों से याद किया है। वे इस बात को मानते हैं कि उन्हें जो भी ज्ञान मिला है वह गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के कारण ही मिला है। उनके मन में गुरु के प्रति असीम सम्मान का भाव है। यह बात उनके द्वारा अपनी कविताई में गुरु के नाम लेने के तरीके से स्पष्ट हो जाती है। लेकिन उनके मन में यह सम्मान का भाव तभी तक बरकरार रहता है जब तक कि मत्स्येंद्रनाथ गुरु की भूमिका में होते हैं । गुरु के भटकाव को वे गंभीरता से लेते हैं। जिस गुरु के प्रति उनके मन में पितृ भाव का सम्मान था उसी गुरु को रास्ते से भटक जाने पर वे चेतावनी देने भी नहीं चुकते है। वे मत्स्येंद्रनाथ को सुनो मुछिन्दर कहकर कठोरता से पुकारते हैं-
बदन्त गोरखनाथ सुनहु मछन्दर तुम ईश्वर के पूता।
बाह्य झरनता जे नर राषे सो बोलो अवधूता।
अस्ति कहूं या कोई न पतीजै बिन आस्ति क्यूं सीधा।
गोरष बोलै सुनौ मुछिन्द्र हीरै हीरा सीधा।।
वह कहते हैं कि उस योग का क्या लाभ जो मोह माया में फंसने से ना बचा सके। गुरुदेव तो चमड़े में धंस गए हैं, शरीर के आकर्षण में फंस गए हैं ऐसे में जब वे गुरु को समझाने में कामयाब होते नहीं दिखते तब उन्होंने किसी भी भौतिक गुरु की आवश्यकता महसूस करना ही बंद कर दिया। उनका मानना है कि मनुष्य चाहे जितनी सीद्धियों,सफलताओं का मालिक हो, काम और मोंह की आंधी उसे उड़ा ले जाती है। यही कारण है कि वे अपने विवेक को ही अपना गुरु बना लेते हैं। विवेक के जागृत हो जाने पर चित्त रूपी चेला भीतर से प्रकाशित हो जाता है। इस सच को जान लेने के बाद गोरखनाथ अकेले घूमते रहते हैं-
ग्यान सरीषा गुरु न मिलिया, चित्त सरीषा चेला।
मन सरीषा मेलू न मिलिया, ताथै गोरष फिरै अकेला।
रहता हमारा गुरु बोलिये,हम रहता का चेला।
मन मानै तो संगि फिरै, नहितर फिरै अकेला।।
विचरण करते हुए वह असम से लेकर पेशावर तक तथा कश्मीर व नेपाल से लेकर महाराष्ट्र तक की लंबी यात्रा करते हैं। कई स्थानों पर नाथ संप्रदाय के केंद्र स्थापित करते हैं और वहां पर योग्य शिष्यों को प्रचार प्रसार के लिए नियुक्त करते हैं। तब से नाथ पंथी आचार्य किसी जगह ठहर कर नहीं रहते हैं। ये निरंतर चलते रहते हैं गोरखनाथ कहते हैं-
मन मानै तो संगि फिरै।
निहतर फिरै अकेला।।
इस यात्रा का प्रभाव ही है कि उनके अनुयाई उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, पंजाब ,राजस्थान, गुजरात तथा महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। एक तरह से देखें तो इनकी महिमा का प्रचार प्रसार अखिल भारतीय है। इन नाथ पंथी योगीयों को अपने भ्रमण के दौरान समाज में जड़ जमा कर बैठी हुई विभिन्न रूढ़ियों से टकराना पड़ा। गोरखनाथ को भी ऐसी रुढ़िवादी शक्तियों से दो चार होना पड़ा है। जिसकी तीव्रता से ये रूढ़ियों पर प्रहार करते हैं उसी तीव्रता से रुढ़िवादी लोग इन पर हमले करते रहते। ऐसे में उन्हें जगह-जगह निंदा तथा वाद विवाद से टकराना पड़ा है। गोरख बानी में ऐसे हमलो के कई प्रमाण मिलते हैं ।गोरखनाथ को विवाद करना पसंद नहीं था। वे अनावश्यक विवाद से बचने की भरपूर कोशिश भी करते हैं तथा योगियों को भी यह सलाह देते हैं-
कोई बादी कोई बिबादी।
जोगी को बाद न करना।।
गोरखनाथ संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान थे। लेकिन उन्हें अपने मत का प्रचार प्रसार आम जनमानस में करना था जो इस भाषा में संभव नहीं था। यही कारण है कि इन्होंने लोक भाषाओं का सहारा लेकर अपना ऐतिहासिक कार्य पूरा किया। इन्होंने ने जनपदीय भाषाई में कविताई को प्रतिष्ठित किया। यह वही दौर था जब जनपदीय भाषाओं का जन्म हो रहा था और वे अपनी बाल्यावस्था में थी। गोरखनाथ की बानी केवल इसलिए अनोखी नहीं है कि वह धार्मिक मतवादों में से सामान्य जन का मार्ग प्रशस्त करती है अपितु वह जनपदीय भाषा में लोकधर्म का मर्म भी प्रस्तुत करती है। वह शास्त्रीय भाषा की महिमा के बजाय सामान्यजन की भाषा में बखान करते हैं। इसीलिए यह ध्यान से देखें तो गोरखनाथ भोजपुरी के आदि कवि तो है ही साथ ही अवधी और खड़ी बोली के भी। भक्तिकाल के कवि कबीर तथा तुलसीदास ने जिस साफगोई से जनपदीय भाषा का पक्ष लिया है उसमें गोरखनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संत काव्य प्राथमिक तौर पर जनपदीय भाषा की महत्ता को स्थापित करने वाली कविता है। गोरखनाथ इस भाषाई क्रांति के आग्रधावक थे और गोरखबानी इसका महत्वपूर्ण दस्तावेज है। गोरखबानी के बिना जिस संत काव्य का रूप आज हम देखते हैं वह संभव नहीं था‌‌। भाषाई दृष्टि से अब गोरखबानी की महत्ता पर विचार करने की जरूरत है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल भले ही गोरखनाथ की रचनाओं की साहित्यिकता पर सवाल उठाते हुए लिखते हैं कि उन रचनाओं की परंपरा को हम काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं कह सकते हैं। उनकी रचनाओं का जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियां और दशाओं से कोई संबंध नहीं है। वे सांप्रदायिक शिक्षा मात्र है‌ अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकती। पर यह गोरखनाथ के साहित्य को देखने का उनका संकुचित नजरिया ही मात्र है। केवल कुछ चुनी हुई रचनाओं के आधार पर उनके साहित्य को संप्रदायिक शिक्षा बता देना अनुचित है। वास्तव में गोरखनाथ का साहित्य उस नींव की तरह है जिस पर आगे चलकर संत कवि अपने काव्य की बहुमंजिला इमारत खड़ा करते हैं। गोरखनाथ का साहित्य सार्वकालिक व सार्वदेशिक का प्रतिनिधित्व करता है।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
मो.8400088017