मित्रो __ _ _ _ _🌞
रात अँधेरी बीतेगी ही तय है मित्रो ।
होगा प्रात न इसमें कुछ संशय है मित्रो ।।
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निकले ही निकलेगा सूरज बदली से ।
धूप खिलेगी राय न इसमें द्वय है मित्रो ।
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लोहा लेता रहता है संघर्षों से जो ।
होती उसको प्राप्त अवश्य विजय है मित्रो ।।
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आँख खोलकर चलता है जो साथ समय के ।
देता उसका साथ सदैव समय है मित्रो ।।
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कर पाएगा उसका बाल न बाँका कोई ।
लोभ न जिसके निकट कि जो निर्भय है मित्रो ।।
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विचलित होता जो न देख संकट के बादल ।
होता सफल कि जिसका दृढ़ निश्चय है मित्रो ।।
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उसके सम्मुख सभी सम्पदाएँ हैं बौनी ।
जिसको प्राप्त सुविद्या और विनय है मित्रो ।।
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जीवन उसका धन्य कि जो परहित में जीत ।
उसके लिये मरण भी मंगल मय है मित्रो ।।
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जो स्वदेश की रक्षा में निःशेष हुआ है ।
उसका नाम अमर है यश अक्षय है मित्रो ।।
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मात्र न वेश विशेष साधु का सच्चा परिचय ।
साधु वही है जिसका सरल ह्रदय है मित्रो ।।
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हर्ज नहीं गिर गये कभी गर चलते चलते ।
गिर कर नहीं सँभलते यह विस्मय है मित्रो ।।
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प्रेम देवता से न देवता ऊँचा कोई ।
मन से बड़ा न कोई देवालय है मित्रो ।।
🎍बालसोम गौतम-बस्ती(उप्र)🎍