अजीब शहर में ये सुनगुनी सी कैसी है,

अजीब शहर में ये सुनगुनी सी कैसी है,
ये धूप जून में अब कुनकुनी सी कैसी है।

अभी जवानी भी तो ठीक से नही आयी,
अभी से पांव में ये चुनचुनी सी कैसी है।

कोई भी फेल हमारा नहीं था ऐसा फिर,
हमारे क़ब्र में ये रौशनी सी कैसी है।

मेरे लिए तो अभी तक वो एक मोअम्मा है,
वो शक्ल ख्वाब में एक मोहनी सी कैसी है।

वही तो है मेरे इस सल्तनत की नूरजहाँ,
जो धूल,मिट्टी,में देखो सनी सी कैसी है।

हां वारदात कोइ खास तो नही होती,
खबर में उस के मगर सनसनी सी कैसी है।

अभी तो चांद की चौदह गुज़र रही है नदीम,
अभी से रात ये इतनी घनी सी कैसी है।

नदीम अब्बासी “नदीम“
गोरखपुर ॥