“कृष्ण भी सबके लिए”
इंसान क्या भगवान बन।
भगवान को ही रोक लेगा ?
क्या छोटी-छोटी छत बनाकर।
वह बादलों को रोक लेगा ?
क्या छोटे-छोटे बांध से वह।
जल प्रलय को रोक देगा?
क्या चार पंखों के सहारे।
वह आंधियों को मोड़ देगा?
क्या पर्वतों को लांघ कर।
वह व्योंम को भी लांघ लेगा?
क्या धरा को घूम कर वह।
हर वलय भी घूम लेगा ?
क्या घृणा का बीज बोकर।
वह हर हृदय को जीत लेगा?
हे कृष्ण क्या मुमकिन यहां।
यह एक मानव के लिये।।
जग जीतता है वह ही यहां।
जो जी रहा सबके लिये।।
जो कष्ट अपने भी भुला कर।
सुख बो रहा सबके लिये।।
वह इंसान है तो भी क्या।
गर भाव से वह भर गया तो।।
वह राम है सबके लिए और।
वह कृष्ण भी सबके लिए।।
बाल कृष्ण मिश्र “कृष्ण”
26.8.2024
बूंदी राजस्थान।