दुखद अत्यंत दुखद, आर्य परिवार में शोक

*ओ३म्*
🕉️ आर्य परिवार में शोक 🕉️
जिसने भी *मृत्यु लोक* में जन्म लिया है वह *सुख -दु:ख के चक्रव्यूह* में घूमता रहता है। मगर शत-प्रतिशत धार्मिक जीने वालों के साथ जब यह घटित होता है तो अचानक *धर्म संकट व्यवस्था* पर चिंतन प्रारंभ होने लगता है।
इसी तरह की घटना आर्य समाज के गौरव। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त। वैदिक धर्म के पुरोधा *आदरणीय हरिलाल गुरुदास मल डलवानी* हैं। आपका संपूर्ण परिवार शत-प्रतिशत वैदिक धर्म का अनुयाई है। जिनके करनी व कथनी में पूर्ण एकता है।
*माता कलावती*
आपकी उम्र ९० के आसपास है।आप ३६५ दिन अपने आवास से लगभग २५ किलोमीटर प्रातः ६.३० तक आर्य समाज मंदिर सैजपुर वोघा पहुंच जाती हैं। विद्वानों का सत्संग लाभ लेती हैं। पुनः सर्वप्रथम घर से लाया हुआ प्रातः राशि पहले। *विद्वानों को, पुनः याचकों को* को देकर बिना अन्न जल ग्रहण किए घर को प्रस्थान करती हैं।
*आर्य पुत्री दीपा डलवानी*
बेटी दीपा प्रतिदिन यानि *३६५ दिन* प्रातः काल उठकर आर्य समाज में आमंत्रित विद्वानों के लिए जलपान तैयार करके भेजती है। पुनः दोपहर का भोजन।साथ में पूरा डलवानी परिवार क्रमशः अपने -अपने सामर्थ्य व योग्यता के अनुसार आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहते हैं।
*दैनिक संध्या+यज्ञ*
आज परिवारों में कोई आर्य समाजी, कोई पौराणिक, कोई बौद्ध तो कोई सदस्य नास्तिक भी होता है। मगर यह समस्त डलवानी परिवार प्रतिदिन *पारिवारिक यज्ञ व संध्या* करता है।
*गो-भक्त परिवार*
समस्त डलवानी आर्य परिवार गो-भक्त है।आपके परिसर में लगभग उच्च नस्ल की लगभग ५० नौवें और पांच -छ: उच्च नस्ल के बैल हैं जिनकी उत्कृष्ट सेवा प्रतिदिन होती हैं।
*दानी परिवार*
आदरणीय डलवानी परिवार *विभिन्न आर्य संस्थाओं, गुरुकुलों व पात्र लोगों* को उदारता पूर्वक दान करते हैं। आदरणीय हरिभाई के संरक्षण में क ई अनाथ बच्चे *गुरुकुल शिक्षा निशुल्क* प्राप्त कर रहे हैं।
*३६५दिन यज्ञ+सत्संग*
आदरणीय हरिभाई के पिता श्री ने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु *अहमदाबाद महानगर में आर्य समाज की स्थापना* की आज भी भारत की ये अद्वितीय आर्य समाज मंदिर है जहां प्रतिदिन *दोनों समय यज्ञ व वेद प्रवचन* होता है। समस्त डलवानी परिवार इसका संचालन बड़ी श्रद्धा, उदारता व समर्पण भाव से करता है।भारत वर्ष के कोने-कोने से विद्वान यहां पर एक माह का प्रवास करते हैं। विद्वानों के *आवास, भोजन, दक्षिणा* की व्यवस्था डलवानी परिवार करता है। यहां आने वाले विद्वान इस समाज की देखरेख में * *प्रत्येक रविवार को अहमदाबाद के समस्त आर्य समाजों में जाकर वैदिक धर्म* का प्रचार -प्रसार करते हैं।
*आदि भौतिक त्रासदी*
ऐसे धर्म निष्ठ, कर्तव्य परायण, परोपकारी डलवानी परिवार अचानक *आदि भौतिक दुःख के चक्रव्यूह* में आकर परिवार के १९ वर्षीय , विलक्षण प्रतिभा, मातृ-पितृ भक्त बालक प्रियवर *आदित्य डलवानी* को खो देता है। इससे केवल डलवानी परिवार ही नहीं *समस्त आर्य जगत शोक सागर* में डूबा है।
मन तरह-तरह के संदेह के घेरे में आता है।हे ईश्वर! जो रात दिन तेरी ही धुन।तेरी लगन! में तुझको ही समर्पित है उसे ऐसा *असहनीय दंड* क्यों? …… अनेकों अधर्मी रात दिन फल फूल रहे हैं। विश्व में तांडव मचा रहे हैं उन पर आपकी गदा क्यों नहीं चलती? क्या वास्तव में आप हो भी या हम आपके लिए कल्पना करके बैठे हैं? इन विचारों में हर आस्तिक का मन उलझा रहता है।जो भी इस दर्दनाक दृश्य का साक्षी है वो मुझसे बार बार यही प्रश्न करता है।
*ईश्वर से संवाद*
जब मैं इन प्रश्नों को लेकर परमात्मा से अंतर्मन में लेकर संवाद करता हूं तो परमात्मा प्रेरणा देता है।
*जिस संसार में हमने जन्म लिया है इसका नाम ही है *मृत्यु लोक*। यहां जन्म और मृत्यु एक स्वाभाविक घटित होने वाली निरंतर प्रकृया है। रही बात *सुख -दुख* की इसमें परमात्मा ने किसी को सुख देता है न दुख। सुख दुख में दो काम होते हैं।एक – निमित्त और दूसरा कारण। *निमित्त में व्यक्ति, परिवार, समाज व प्रकृति के प्रकोप होते हैं और कारण में केवल जीवात्मा* होता है।रही बात ईश्वर न तो किसी की मृत्यु में निमित्त होता है न कारण वह तो केवल *न्यायपूर्वक कर्मों का फल* देता है। इससे अधिक ईश्वर की कोई भूमिका नहीं होती है। हां जहां जहां जीवात्मा के साथ अन्याय होता है *परमात्मा उसकी भरपाई कर देता है।कब करेगा ? कैसे करेगा? इसे कोई जीवात्मा नहीं बता सकता।*
* *कतिपय शंकाएं*
[१] एक बालक अल्पायु में संसार छोड़ देता है? उसका कोई दोष भी नहीं। जबकि बालक चरित्रवान, धार्मिक, संस्कारित है फिर भी उसे मृत्यु के मुख में धकेलना ये ईश्वर का न्याय नहीं अन्याय है।
*सम्यक समाधान*
आपकी संवेदना धर्मानुकूल है।जो मानव संवेदना शील है वो यही कहेगा!
विचारणीय विंदु यह है कि हमारे और ईश्वर की चिंतन में अंतर है।हम अपनी बुद्धि से सोचते हैं मगर ईश्वर का। *अंकगणित एकदम* अलग है।आप धैर्य से ईश्वर के गणित पर विचार करेंगे सब समझ में आ जायेगा।
कोई मानव आयु में छोटा है या बड़ा है।काला है या गोरा है। अमीर है या गरीब है। प्रभावशाली है या प्रभाव हीन है।ये गणित हम और अन्य जीवात्माओं का है।
ईश्वर का गणित है *सभी जीवात्माएं हैं।आयु शरीर की हैती है आत्मा की नहीं।छोटा या बड़ा शरीर होता है आत्मा नहीं। मृत्यु नाम परिवर्तन का है। मृत्यु शरीर की हैती है आत्मा की नहीं।हम जो संबंध बनाते हैं वो आत्माओं से नहीं शरीरों से बनाते हैं। आत्माएं तो सब एक समान हैं।* संबंधों के कारण ही हम आत्माएं एक दूसरे से सुखी दुखी होते हैं।
इस बीमारी से बचने के लिए *हमें जन्म लेने से बचना होंगा!उसका एक ही तरीका है कि हम मोक्ष की तैयारी करें* जब तक हमारे संबंध शरीरों सूं बने रहेंगे हम सभी इस *सुख दुःख के चक्रव्यूह* में फंसते रहेंगे।यही सच्चाई है इसे जितना जल्दी स्वीकार करेंगे उतनी जल्दी *मृत्यु लोक* से छुटकारा प्राप्त होगा।
[२] जब धर्मी व अधर्मी। सदाचारी व दुराचारी दोनों को मरना अनिवार्य है तो फिर *धर्म, सत्संग, दान, परोपकार* करने से क्या फायदा?
*सम्यक समाधान*
यह बात एक साधारण तरीके से ही समझ में आ सकती है। जब कोई अधर्मी व्यक्ति मरता है तो लोग खुशी मनाते हैं।उसका अपयश फैलता है।उसकी मृत्यु पर कोई भी शोक नहीं मनाता। ठीक इसके विपरीत *धार्मिक, सदाचारी, चरित्रवान व्यक्ति के जाने पर सभी के हृदय द्रवित हो जाते हैं।लोग उसके गुणों को अपनाने की प्रेरणा करते हैं।
मृत्यु के बाद अस्तित्व समाप्त नहीं होता। पुनर्जन्म होता है। *पुनर्जन्म का सिद्धांत कर्मों के खाते*पर ही चलता है। धार्मिक जीवन, संयमित जीवन, परोपकारी, विद्वान लोग जब शरीर छोड़ते हैं तो उनकी दो गति होती है। *या तो वो मोक्ष में चले जाते हैं या फिर धर्मात्मा परिवारों में जन्म लेकर पुनः धर्मयात्रा पर चल देते हैं*
इसके विपरीत जो मानव योनि पाकर अधर्म, अत्याचार, अन्याय करते हैं उनसे परमात्मा मानव‌ शरीर छीन लेता है और वो *बिना बुद्धि और बिना हाथ,वाणी व कर्म स्वतंत्रता से हीन* पशु पक्षी कीट पतंग योनियों में चले जाते हैं।
🙏 *विनम्र श्रद्धांजलि*🙏
हे अखिल कोटि ब्रह्माण्ड नायक परमात्मा आपसे प्रार्थना है कि *देवलोक गामी प्रियवर आदित्य* को पुनः धर्मात्मा परिवार में जन्म देकर अपने अधूरे कार्यों को पूरा करने का अवसर प्रदान करें। मुझे पूर्ण विश्वास है आप हमारी इस न्याय युक्त प्रार्थना को स्वीकार करेंगे। दूसरी प्रार्थना *उनके माता-पिता व समस्त आर्य परिवार* को धैर्य,साहस, प्रेरणा करें वो आपकी भक्ति परोपकार के सारे कार्यों को करने में सक्षम हो जायें।आप न्याकारी व दलालू और कृपालु भी हैं।जो आपके उपासक हैं उन पर आपकी विशेष कृपा होती है इसका भी हमें अनुभव हुआ है अतः आपका यह परिवार अनन्य उपासक है इसे आप मुझसे अधिक जानते हैं।हे प्रभो!अपनी कृपा दृष्टि करते रहना!!!
🕉️ *विशेष सूचना*🕉️
जो आर्य परिवार अपनी *हार्दिक संवेदना इस परिवार को* देना चाहते हैं वो इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।
☎️9824332338☎️

💐 *विनम्र श्रद्धांजलि*💐
आचार्य सुरेश जोशी
एवं
पंडिता रुक्मिणी देवी।
आर्यावर्त साधना सदन पटेल नगर दशहराबाग बाराबंकी उत्तर प्रदेश।

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