कुछ खास तो नहीं

कुछ खास तो नहीं था आज का दिन फिर मन क्यों इतना अशांत है

सुबह की लालिमा भी वही थी, दोपहर की चिलचिलाती धूप भी वही थी, शाम को घर जाने की होड़ में चिड़ियों की चहचहाहट भी वही थी फिर मन क्यों इतना अशांत है

बस कुछ मुस्कुराते चेहरे शामिल थे जो पिछले कुछ सालों से अपने से हो गए थे , जो आज बिछड़ रहे हैं

हां पिछले कुछ सालों का साथ था जो अब छूट रहा है

छूट रहा है मेरे गुरुजनों की डांट उनका स्नेह

छूट रहा है दोस्तो की हठी- ठिठोली उनका साथ सब तो छूट रहा है शायद इसीलिए मन इतना अशांत है

अरे हां यह आखरी दिन था कॉलेज का इसीलिए तो मन इतना अशांत है।

 

……माण्डवी द्विवेदी

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