🦚🦚 ओ३म् 🦚🦚
🌼 उत्कृष्ट शंका समाधान 🌼
🕉️ उत्कृष्ट शंका -१🕉️
क्या बहु कुंडीय यज्ञ और सामूहिक कुंड एक ही है या दो?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
दोनों अलग-अलग हैं।बहु कुंडीय का अर्थ है जहां पर अनेक कुंड हों और बहुत यजमान हो!
सामूहिक यज्ञ का मतलब है कुंड एक ही हों और आहुति देने वाले अनेक हों!
🕉️ उत्कृष्ट -शंका -२🕉️
क्या बहु कुंडीय और सामूहिक दोनों सही हैं? वेदानुकूल हैं?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
सामूहिक यज्ञ वेदानुकूल है और बहु कुंडीय यज्ञ अवैदिक है।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -३🕉️
बहु कुंडीय यज्ञ करने में क्या हानि है?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
बहुत हानियां हैं।कुछ की चर्चा करते हैं।
(१) बहु कुंडीय यज्ञ का वेद में कोई प्रमाण नहीं है।आपके मन में शंका हो सकती है कि हम वेद का प्रमाण क्यों मांग रहे हैं।इसका उत्तर है।🌾 परं प्रमाणम श्रुति 🌾 वेद का प्रमाण परं प्रमाण है और शास्त्र अपर प्रमाण में आते हैं।वेद ईश्वरीय वाणी है जो मानव मात्र के कल्याण के लिए है।वेद में समस्त सत्य विद्याएं है। जिसमें यज्ञ भी सत्य विद्या है जिससे 🌿 पंच महायज्ञ 🌿 अश्वमेध यज्ञ 🌿 राजसूय आदि अनेकों यज्ञों का वर्णन है। यदि बहु कुंडीय यज्ञ सत्य विद्या में आती तो वेदों में उसका भी वर्णन अवश्य होता!
(२) बहु कुंडीय यज्ञ व्यावहारिक भी नहीं है। अनेक कुंडों को बनाना।अनेक यजमानों को तैयार करना। अनेकों व्यवस्था करना इसमें समय, स्वास्थ्य,धन तीनों का अपव्यय होता है। जो कर रहे हैं वो इसके भुक्त भोगी भी हैं किसी कारण वो सत्य नहीं बताते वो उनकी मर्जी है।
(३) अनेक कुंडों पर एक आचार्य यज्ञ करायेगा तो जाने -अनजाने अनेक अव्यवस्थाएं। अनेक त्रुटियां! होना अनिवार्य हो चाहे कितना ही योग्य आचार्य हो! मानना न मानना आपकी स्वतंत्रता है।
(४) अगर हर कुंड पर अलग-अलग आचार्य होगा तब भी त्रुटियां होंगी क्योंकि हर आचार्य की योग्यता, सामर्थ्य, अनुभव, प्रस्तुति अलग-अलग होना उनका गुण कर्म स्वभाव होता है।
(५) यदि आप कहें कि एक मुख्य आचार्य एक नियम बनाकर सभी आचार्यों को लिखित प्रतिलिपि दें या पहले से प्रशिक्षित करके नियुक्त करें तब भी बहु कुंडीय यज्ञ असंभव है क्योंकि तब ** गुण वृत्ति विरोध 🌾 दुःख आकर अव्यवस्था पैंदा करेगा।
(६) प्रत्यक्ष आज तक के बहु कुंडीय यज्ञों को देखा गया है कहीं धुआं ही धुआं कुंडों पर है।कहीं समिधा समाप्त हो जाती है।कहीं सामग्री समाप्त।
अतः सामग्री अव्यवस्था। मंत्रो का व्यतिक्रम। देखरेख अव्यवस्था। तारतम्य अव्यवस्था के चलते एवं सदैव असंभव होने से बहु कुंडीय यज्ञ अवैदिक है। जबकि एक कुंड व सामूहिक सदैव,सरल,सुलभ,सर्व साधारण के सामर्थ्यानुकूल होने से सामूहिक कुंड वैदिक है। और भी अनेक दोष हैं विस्तार भय से लिखना संभव नहीं है।
🕉️ उत्कृष्ट संख्या -४🕉️
हमने चैनलों व वीडीयो के माध्यम से देखा है कि बहु कुंडीय यज्ञ में सभी कुंड समान से जलते हैं और अच्छे लगते हैं।
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
ऐसा नहीं है।ये तो कैमरे का कमाल और सुनियोजित व्यवस्था से होता है जिससे लोगों को कहने का मौका न मिले।जिस समय सभी कुंड जल रहे होते हैं उसी समय वीडियो बना लिया जाता है।
🪷🪷 निजी अनुभव 🪷🪷
मैं जब भी यज्ञ कराता है। पुरोहित बनने से पहले ही संकल्प मन ही मन करता हूं कि जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होगा यज्ञ में धुआं नहीं होने दुंगा।तब मुझे १००% ध्यान यज्ञ वेदी पर देना पड़ता है। इसमें शारीरिक, मानसिक,आत्मिक तीनों शक्ति लगानी पड़ती है तब कहीं जाकर सफलता मिलती है। कल्पना करो जब बहु कुंडीय होगा तब क्या इतना सामर्थ्य संभव है? बिल्कुल नहीं। चाहे कोई कितना ही दावा करें! बहु कुंडीय यज्ञ में शास्त्र विधि कदम-कदम पर खंडित होती है।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -५🕉️
कुछ लोग कहते हैं संस्कार विधि के गृहाश्रम प्रकरण में पांच कुंड का वर्णन है। ऋषि बहु कुंडीय यज्ञ कहते हैं?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
संस्कार विधि की पुस्तक तो आपके पास है फिर कोई कुछ कहे आप साधे पुस्तक खोलकर खुद देखिए!
पहली बात तो पांच शब्द का उसमें प्रयोग है ही नहीं।चार कोनों में चार कुंड।एक मध्य में।अब जोड़कर पांच होते हैं। मगर महर्षि दयानंद ऋषि हैं। ऋषि मतलब दूरदृष्टा।वो जानते थे कि कुछ लोग अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए पांच का प्रमाण देंगे अतः ऋषि ने वहां पर अथवा लिख दिया।अथवा एक ही कुंड में भी कर सकते हैं।इस बात को वो कहते नहीं और आप स्वाध्याय करते नहीं तो 🍁 चोर -चोर मौसेरे भाई 🍁 हो ही जायेगा।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -६🕉️
क्या दर्शन पड़ने से यज्ञ शास्त्र समझ में आ जायेगा!
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
भोले भाई आप ४५ साल न्याय दर्शन पढ़ लो! उसमें यज्ञ शास्त्र का विषय ही नहीं है।प्रकरण के आधार पर किसी किसी दर्शन में मिल जायेगा। मीमांसा में कर्म शास्त्र है वहां कुछ परिचर्चा है प्रकरण अनुसार।
बहु कुंडीय यज्ञों के लिए गृह्य सूत्रों का अध्ययन जरूरी है। महर्षि दयानंद जी ने संस्कार विधि में प्रमाण के रूप में दर्शनों को नहीं गृह्यसूत्रो को प्रमाण माना है।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -७🕉️
क्या जो वेद- प्रचार में बाधा डालेगा। ईश्वर उसे कढ़ा दंड देगा?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
वेद प्रचार में बाधा डाली है या नहीं इसका निर्णय कोई अपने मतानुसार नहीं कर सकता। ईश्वर सर्वज्ञ है।वो जानता है कि किसने वेद-विपरीत आचरण किया है! वहां मुहम्मद की तरह किसी रसूल, एजेंट की जरूरत नहीं होती।
दूसरा ईश्वर न्याय कारी है वो न कड़ा दंड देता है न ढीला। यथायोग्य दंड देता है और वह दयालु भी है सामर्थ्य के अनुसार व राग-द्वेष से रहित होकर दंड देता है।वह पहले निर्णय करेगा कि बहु कुंडीय यज्ञ सही है या ग़लत। यदि सही है तो उसको दंड देगा जो बहु कुंडीय यज्ञ का विरोध करते हैं और यदि बहु कुंडीय यज्ञ गलत है तो उनको दंड देगा जो विद्याभिमान में किसी को भी बिना अधिकार के श्राप देने का दंभ भरते हैं।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -७🕉️
तो क्या अभी यह ईश्वर को तय करना पड़ेगा कि बहु कुंडीय यज्ञ वैदिक है या अवैदिक?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
नहीं -नहीं! तय तो शास्त्र प्रमाणों से हो चुका है कि बहु कुंडीय यज्ञ अवैदिक है। सामूहिक यज्ञ वैदिक है। क्योंकि न तो किसी वैदिक शास्त्र में इसका वर्णन है न ही व्यावहारिक है फिर भी जो लोग अपने प्रयोजन वा विद्याभिमान में या अपने अहं को संतुष्ट करने में लगे हैं उनको परमात्मा कर्म फल के रूप में दंड देगा!कितना देगा ये किसी मानव के सामर्थ्य का ज्ञान नहीं है!
🕉️ उत्कृष्ट शंका -८🕉️
एक कुंड से कम पर्यावरण की शुद्धि और बहु -कुंडो से अधिक पर्यावरण की शुद्धि नहीं होगी!
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
पर्यावरण के अधिक व कम शुद्धि कुंडों से निर्धारित नहीं होती।उसकी शुद्धि में ऋतुनुकूल सामग्री। पवित्र यजमान। पवित्र संकल्प और पवित्र पुरोहित चाहिए। यदि ये सामर्थ्य जब एक ही 🔥 यज्ञ वेदी 🔥 में संभव हो सकता है तो बहु -कुंड बनाना कहां की बुद्धिमानी है इतना तो आप भी सोच सकते हैं।
मोटी भाषा में समझें।५०० यज्ञ कुंडों में डाली जाने वाली आहुति जब एक ही कुंड में दी जा सकती है तब अतिरिक्त समय। अतिरिक्त व्यवस्था। अतिरिक्त धन की क्या आवश्यकता है? यही आपको समझना है।यह आप समझ गए तो आप यह भी समझ जायेंगे कि बहु कुंडीय यज्ञ अवैदिक है।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -९🕉️
क्या एक लाख आहुति भी एक ही ही कुंड में दी जा सकती है? क्या इसका प्रमाण है?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
जी हां! अब सब मैं ही नहीं बताऊंगा। कुछ आप भी मेहनत कीजिए। नहीं तो लोग आपको कहेंगे आप मूर्ख हो! अनाड़ी हो! आपको ईश्वर कड़ा दंड देगा! यदि इस बंदर घुड़की से बचना है तो मैं प्रमाण देता हूं उसे देखो!दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।
प्रमाण इस प्रकार है। संस्कार विधि के 🍁अथ सामान्यप्रकरणम्🍁 को खोलिए।आगे लिखा मिलेगा 🌲 यज्ञकुंड का परिणाम 🌲 इसे पढ़िए।ये है महर्षि दयानंद सरस्वती जी का प्रमाण। यहां आपको पता लगेगा अनुमान प्रमाण से कि जितना भी पर्यावरण शुद्ध करना हो वो एक ही कुंड से संभव हो सकता है।
🕉️ उत्कृष्ट शंका -१०🕉️
क्या जितना महर्षि दयानंद कहते हैं उतना ही मानें? अधिक नहीं मान सकते हैं?
🏵️ उत्कृष्ट समाधान 🏵️
आप उससे अधिक भी मान सकते हैं। मगर मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए! ऋषि दयानंद जी जितना जानते थे क्या आप उसका एक तिहाई भी जानते हैं। महर्षि दयानंद जी ने वेदों पर भाष्य किया आप एक मंत्र का भी भाष्य कर सकते हैं? ऋषि दयानंद जी ने समाज कल्याण के लिए समाधि का त्याग किया आप समाधि का स्वाद भी चखे हैं! ऋषि दयानंद ने तो अपने लिए कुटिया भी नहीं बनाईं क्या आप एक दिन भी गंगा की रेती पर लेट सकते हैं? जब आप ऋषि दयानंद जी के तुल्य भी नहीं हो सकते इस जन्म में तो आप उनसे अधिक कैसे कर सकते हैं ये आपकी ही आत्मा जान सकते हैं!
🌻🌻 अंतिम उत्कृष्ट शंका 🌻🌻
क्या कोई आपको कह दे कि ईश्वर आपको दंड देगा! छोड़ेगा नहीं! तो ऐसा हो जाएगा।
🌼🌼 उत्कृष्ट समाधान 🌼🌼
पहली बात जो धर्मात्मा होता है वो कभी ऐसी बात नहीं कहता। क्योंकि उसका वाणी पर संयम होता है।
दूसरी बात जब कोई भी कर्म जीवात्मा शुभ,अशुभ, मिश्रित या निष्काम करता है वहां पर सर्वव्यापक परमात्मा विद्यमान रहता है उसे पता है कि आपने क्या कर्म किया और उसका क्या दंड या पुरुस्कार होता है!
तीसरी बात यदि आपने गलत किया है तो उसका फल दुख ही होगा उसमें किसी के कहने का सर्वज्ञ ईश्वर को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि अच्छे-बुरे सब उसी की संतानें होती हैं।
जब कोई से व्यक्ति देखता है कि मेरे शिष्यों के सामने मुझे ग़लत कहा जा रहा है तब वो तिलमिला जाता है और फिर उसकी वाणी अनियंत्रित हो जाती है। हालांकि यह भी उसका भ्रम है क्योंकि जो विद्वान होते हैं हो सत्य को जानने के लिए अपना पक्ष रखते हैं न कि किसी को अपमानित करने के लिए। हां जब किसी को यह भ्रम हो जाता है कि मैं ही अकेला विद्वान हूं। मैं ही शास्त्र पड़ता हूं। मैं ही तपस्वी हूं। सब कुछ में मेरे अलावा और कोई नहीं तब उसका अहं टकरा जाता है और बुद्धि में अविद्या छा जाती है। इसलिए किसी के कहने से कुछ नहीं होता है हां कोई हमारे लिए आशीर्वाद देता है तो हमारा उत्साह बढ़ता है कोई श्राप देता है तो मनोबल गिरता है मगर जो महान होते हैं वो न 🌸 अभाव में जीते हैं।🌸 न प्रभाव में जीते हैं वो अपने 🌸 स्वभाव में जीते हैं।
सार यही है कि बहु कुंडीय यज्ञ अवैदिक व सामूहिक यज्ञ वैदिक है। दोनों में यही अंतर है।
विदुषामनुचर:
आचार्य सुरेश वैदिक प्रवक्ता