प्रस्तावना –हिम श्रंखलाओं से निकलने वाली सरिताएं मुख्य जल प्रवाहिनी की व्याकुल बाँहों में लीन हो जाने के लिए प्रवाहमान होकर चली जाती है। रूपहली चाँदनी और सुनहली रश्मियाँ सरिता की अल्हड़ लहरों पर थिरक–थिरककर उसे मोहित करना चाहती हैं। रूपहली चाँदनी और सुनहली रश्मियाँ न जाने कब से किसी में अपना अस्तित्व खो देने को आतुर हैं। अपने अस्तित्व को एक–दूसरे में लीन कर देने की इस आदिम आकांक्षा को मानव युग–युग से देखता चला आ रहा है। प्रकृति के इस अनोखे रूपजाल को देखकर वह स्वयं को उसमें बद्ध कर देना चाहता है और फिर उसके हृदय से सुकोमल, मधुर व आनन्ददायक गीतों का उद्गम होता है, उसके अन्तर्मन में गूंजते शब्द, विचार और भाव; उसकी लेखनी को स्वर प्रदान करने लगते हैं। परिणामत: विभिन्न विधाओं पर आधारित साहित्य का सृजन होता चला जाता है।
इस प्रकार साहित्य में युग और परिस्थितियों पर आधारित अनुभवों एवं अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। यह अभिव्यक्ति साहित्यकार के हृदय के माध्यम से होती है। कवि और साहित्यकार अपने युग–वृक्ष को अपने प्रसन्नता एवं आँसुओं से सींचते हैं, जिससे आनेवाली पीढ़ियाँ उसके मधुर फल का आस्वादन कर सकें।
साहित्य जीवन दर्पण का अर्थ–
साहित्य वह है, जिसमें प्राणी के हित की भावना निहित है। साहित्य मानव के जीवन और सामाजिक सम्बन्धों को दृढ़ बनाता है; क्योंकि उसमें सम्पूर्ण मानव–जाति का हित निहित रहता है। साहित्य द्वारा साहित्यकार अपने भाव और विचारों को दर्पण की सत्यता की तरह समाज में प्रसारित करता है, इस कारण उसमें सामाजिक जीवन स्वयं मुखरित हो उठता है।मानव जीवन में साहित्य का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। साहित्य के अभाव में व्यक्ति के व्यक्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अर्थात हमारे शास्त्रों ने भी सूक्ति प्रदत्त की है -*साहित्य, संगीत कला विहीन, साक्षात् पशु: पुच्छ विषाण हीन:।
समय के साथ साहित्य की विभिन्न परिभाषा बदली हैं
साहित्यकारों ने अपने शब्दों में कहा कि “भिन्न–भिन्न काव्य–कृतियों का समष्टि–संग्रह ही साहित्य है।” कई साहित्यकारों ने साहित्य को “जीवन की आलोचना” कहा है। उपरोक्त विचारों से साहित्य चाहे निबन्ध के रूप में हो, कहानी के रूप में हो या काव्य के रूप .में हो, साहित्य को हमारे जीवन की प्रशंसा या आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।
*साहित्य मानवता का मस्तिष्क है*।
मनोभावनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कवि या लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है। जिस प्रकार बेतार के तार का संग्राहक यन्त्र आकाशमण्डल में विचरती हुई विद्युत् तरंगों को पकड़कर उनको शब्दों में परिवर्तित कर देता है, ठीक उसी प्रकार कवि या लेखक अपने समय के परिवेश में व्याप्त विचारों को पकड़कर, समझकर मुखरित कर देता है।
कवि और लेखक समाज के मस्तिष्क भी हैं और आभा मंडल भी, साहित्यकार की पुकार स्वयं के जीवन और समाज की पुकार है। साहित्यकार समाज के भावों को व्यक्त कर सजीव और शक्तिशाली बना देता है। वह स्वयं के साथ समाज का उन्नायक और शुभचिन्तक होता है। उसकी रचना में समाज के भावों की झलक मिलती है। उसके द्वारा साहित्य की रश्मियां समाज के हृदय तक पहुँचती हैं।
*साहित्य जीवन का पारस्परिक सम्बन्ध*–
साहित्य और समाज का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। साहित्य जीवन और समाज का प्रतिबिम्ब है। साहित्य का सृजन जन–जीवन के धरातल पर ही होता है। समाज की समस्त शोभा, उसकी श्रीसम्पन्नता और मान–मर्यादा साहित्य पर ही अवलम्बित है। सामाजिक शक्ति या सजीवता, सामाजिक अशान्ति या निर्जीवता एवं सामाजिक सभ्यता या असभ्यता का निर्णायक एकमात्र साहित्य ही है।
साहित्य जीवन को उत्साहित करता हैं; अतः साहित्य जीवन और समाज से भिन्न नहीं है। यदि समाज शरीर है तो साहित्य उसका मस्तिष्क। साहित्य पुरोधाओं के शब्दों में, “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता के जीवन की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब है।”
साहित्य हमारे आन्तरिक भावों को जीवित रखकर हमारे व्यक्तित्व को स्थिर रखता है।
अनादिकाल से विश्वगुरु भारतवर्ष में दिखाई देनेवाला परिवर्तन अधिकांशतःजीवन दर्शन पर आधारित साहित्य के प्रभाव का ही परिणाम है।
भारतीय साहित्य ने हमेशा आस्था विश्वास के दीप प्रज्ज्वलित करते हुए यह भाव देता है कि शास्त्रों की विजय शाश्वत होती है और शस्त्रों की विजय क्षणिक।
*साहित्य का जीवन पर प्रभाव*–
सत्य तो यह है कि साहित्य साहित्यकार और समाज तीनों कदम–से–कदम मिलाकर चलते हैं। भारतीय साहित्य का उदाहरण देकर इस कथन की पुष्टि की जा सकती है। भारतीय दर्शन सुखान्तवादी है। इस दर्शन के अनुसार मृत्यु और जीवन अनन्त हैं तथा इस जन्म में बिछुड़े प्राणी दूसरे जन्म में अवश्य मिलते हैं। यहाँ तक कि भारतीय दर्शन में ईश्वर का स्वरूप भी आनन्दमय ही दर्शाया गया है।
यहाँ साहित्य की हर विधा सुखान्त रही हैं। इन्हीं सब कारणों से भारतीय साहित्य आदर्शवादी भावों से परिपूर्ण और सुखान्तवादी दृष्टिकोण पर आधारित रहा है। इसी प्रकार भौगोलिक दृष्टि से भारत की शस्यश्यामला भूमि, कल–कल का कलरव उत्पन्न करती हुई नदियाँ, हिमशिखरों की धवल शैलमालाएँ, वसन्त और वर्षा के मनोहारी दृश्य आदि ने भी हिन्दी–साहित्य को कम प्रभावित नहीं किया है जो वास्तव में किसी दर्पण से कम नहीं आंका गया ।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि साहित्य जीवन और समाज का घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध रखने वाला दर्पण है,साहित्य समाज को निर्माण के पथ पर अग्रसर करता है क्योंकि समाज के विचारों, भावनाओं और परिस्थितियों का प्रभाव साहित्यकार और उसके साहित्य पर निश्चित रूप से पड़ता है। इसलिए साहित्य जीवन के दर्पण की तरह है जिसको कभी पृथक्-पृथक नहीं किया जा सकता।
*उपसंहार*–
अन्त में हम कह सकते हैं साहित्य जीवन में आत्मा और शरीर जैसा सम्बन्ध है। साहित्यकार और साहित्य एक–दूसरे के पूरक हैं, इन्हें एक–दूसरे से अलग करना सम्भव नहीं है; अतः आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यकार अपने मनोभावों मे हमेशा अपने जीवन दर्शन के साथ सामाजिक कल्याण को ही अपना लक्ष्य बनाकर साहित्य का सृजन करते रहें।
*कलम मेरी कर्म पथ पर चलना
सत्य को लेकर इशारा करना
ज़िन्दगी में सफल न भी हों तो,
पर तुम सच का दर्पण निहारा करना*।।
ममता जोशी स्नेहा