तेरा हुस्न , चांद चमकने जैसा,
क्यूँ ना बहकूं मैं , बहकने जैसा,
रब की सौगात-सी मिली, तुम हो,
क्यूं ना चहकूं मैं , चहकने जैसा,
दोस्त मिले राह में , कैसे – कैसे,
पर ना भटका मैं , भटकने जैसा,
भर दी मौसम ने कलाई, सावन में,
क्यूं ना खनके ये , खनकने जैसा,
इनको देखा तो मैं , देखते हीं रहा,
फिसलता गया मैं, फिसलने जैसा,
उनके आने की आहट से ही,ये पग,
थिरके हर पल हीं , थिरकने जैसा,
——कामेश्वर कुमार “कामेश”