कवि हूं मन की बातें कह लेता हूं

कवि हूं मन की बातें कह लेता हूं।
तुम जो देते हो उसे सह लेता हूं।।

तुम जो सुनना चाहते उसे कैसें लिखूं ?
अपनी ही भावनाओं में बह लेता हूं।।

कलम से निकला था आईना दिखाने।
अब टूटा आईना लिए मैं रह लेता हूं।।

लोग शोर शराबे में यकीन रखते हैं।
शांति से खुद को सुना मैं गह लेता हूं।।

महफ़िल जब हों न हमारे लिए यारों।
चुपचाप चादर अपनी तह लेता हूं।।

चारों तरफ निकले सब झूठ के कद्र दान।
मैं सच का पुलिंदा लिए ढह लेता हूं।।

जगदीश कौर
प्रयाग राज

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